आज एक राष्ट्रीय अखबार में जर्मन दार्शनिक जार्ज विल्हेल्म हेगेल का यह विचार सत्य वाद-विवाद में नहीं, उस सामंजस्य में है, जो इन दोनों के मेल से उत्पन्न होता है। पढ़ा, वास्तव में यह संदेश मानव चिंतन की एक गहरी दिशा को उद्घाटित करता है। पढ़ने से मुझे यह सिर्फ एक दार्शनिक कथन नहीं, धर्म, आध्यात्म और भारतीय पुराणों की परंपरा में बार-बार प्रमाणित होने वाला सिद्धांत प्रतीत हुआ है।
भारतीय दर्शन में समन्वय को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक, और पुराणों से लेकर भक्ति साहित्य तक, हमें यह संदेश मिलता है कि सत्य किसी एक पक्ष में सीमित नहीं होता, वह विभिन्न दृष्टियों के मेल से ही उसका पूर्ण स्वरूप प्रकट होता है।
उदाहरण के लिए समुद्र मंथन की कथा को देखें। देव और दानव, दो विरोधी शक्तियां एक साथ मिलकर अमृत की प्राप्ति के लिए प्रयास करते हैं। यह कथा महज एक पौराणिक घटना नहीं, यह एक गहन प्रतीक है। यहां वाद (देव) और प्रतिवाद (दानव) के बीच संघर्ष है। अंततः अमृत (सत्य) का उद्भव उनके सामंजस्यपूर्ण प्रयास से ही होता है। यदि यहां सिर्फ एक पक्ष होता, तो मंथन संभव ही नहीं था।
इसी प्रकार भगवद्गीता में अर्जुन और श्रीकृष्ण के संवाद को देखें। अर्जुन के मन में संशय, मोह और प्रश्न हैं यह वाद है। श्रीकृष्ण का उत्तर तर्क और ज्ञान है, यह प्रतिवाद है। लेकिन गीता का सार प्रश्न या उत्तर में नहीं, दोनों के संवाद से उत्पन्न उस संतुलन में है, जहां कर्म, ज्ञान और भक्ति का समन्वय होता है। यही हेगेल के सामंजस्य का भारतीय रूप है।
आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह सत्य स्पष्ट होता है। अद्वैत वेदांत कहता है कि आत्मा और ब्रह्म एक हैं, जबकि द्वैत दर्शन ईश्वर और जीव के भिन्न होने की बात करता है। देखने में ये दोनों मत विरोधी प्रतीत होते हैं, परंतु भारतीय चिंतन ने इन दोनों को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि विशिष्टाद्वैत जैसे मध्य मार्ग के माध्यम से एक संतुलन स्थापित किया। यही समन्वय सत्य की व्यापकता को दर्शाता है।
धर्म के क्षेत्र में भी यही सिद्धांत लागू होता है। विभिन्न धर्म—हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख सभी अपने-अपने मार्ग प्रस्तुत करते हैं। यदि हम केवल मतभेदों पर ध्यान दें, तो संघर्ष उत्पन्न होता है; परंतु यदि हम उनके मूल सिद्धांतों अहिंसा, करुणा, सत्य, प्रेम को देखें, तो एक गहरा सामंजस्य दिखाई देता है। यही वास्तविक सत्य है।
पुराणों में शिव और विष्णु के विभिन्न रूपों का वर्णन भी इसी समन्वय का उदाहरण है। कहीं शिव सर्वोच्च हैं, कहीं विष्णु, अंततः दोनों को एक ही परम सत्य के रूप में स्वीकार किया गया है। हरि-हर की अवधारणा इसी एकत्व को दर्शाती है।
यहां स्पष्ट है कि सत्य किसी एक मत, विचार या दृष्टिकोण में सीमित नहीं होता। वह वाद और प्रतिवाद के बीच संवाद, संतुलन और सामंजस्य में प्रकट होता है। हेगेल का यह विचार भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के साथ अद्भुत रूप से मेल खाता है और हमें यह सिखाता है कि मतभेद से नहीं, बल्कि समन्वय से ही सत्य की प्राप्ति संभव है।
--------------------