सियासी धर्म : राह चुनने से पहले सच और स्वार्थ की पहचान आवश्यक

सियासी धर्म : राह चुनने से पहले सच और स्वार्थ की पहचान आवश्यक

27 अप्रैल, 2026 · 11:12 AM · 9 बार पढ़ा गया

मौसम का तापमान भले ही हर साल बढ़ता-घटता रहता हो, लेकिन आज देश की राजनीति का पारा जिस तरह चढ़ा हुआ है, वह मौसम का असर नहीं, बदलते राजनीतिक संस्कारों का संकेत है। हाल के दिनों में दल-बदल की जो घटनाएं खासतौर पर आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच सामने आई हैं। उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज की राजनीति में विचारधारा अब सिर्फ एक औपचारिक शब्द बनकर रह गई है।
अगर हम इतिहास की ओर देखें, तो त्रेता और द्वापर युग के युद्ध केवल सत्ता के लिए नहीं, सिद्धांतों, धर्म और स्वाभिमान के लिए लड़े गए थे। चाहे वह राम और रावण का युद्ध हो या महाभारत का कुरुक्षेत्र, हर योद्धा अपने पक्ष में अडिग खड़ा था। उन्हें पता था कि वे किसके लिए और क्यों लड़ रहे हैं। उनकी निष्ठा व्यक्तिगत लाभ से नहीं, व्यापक जनहित और धर्म से जुड़ी होती थी।
लेकिन आज का परिदृश्य कुछ और ही कहानी कहता है। यहां निष्ठा का स्थान अवसर ने ले लिया है और विचारधारा का स्थान समीकरणों ने। जो नेता कल तक एक विचारधारा के कट्टर समर्थक थे, वे आज बिना किसी झिझक के दूसरी धारा में शामिल हो जाते हैं। सवाल यह नहीं है कि दल बदलना गलत है या सही, यह देखना जरूरी है कि उसके पीछे का उद्देश्य क्या है। क्या यह जनहित में लिया गया निर्णय है, या फिर व्यक्तिगत लाभ और सत्ता की चाह इसका असली कारण है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर जनता पर पड़ता है। जब नेता अपनी राह बदलते हैं, तो उनके साथ चलने वाली जनता भी भ्रमित हो जाती है। लोकतंत्र में जनता ही असली शक्ति होती है, लेकिन जब वही शक्ति असमंजस में पड़ जाए, तो व्यवस्था कमजोर होने लगती है। विश्वास टूटता है, और राजनीति एक भरोसेमंद व्यवस्था के बजाय एक खेल बनकर रह जाती है।
ऐसे समय में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सही रास्ता कैसे पहचाना जाए। इसका जवाब बहुत जटिल नहीं है। सबसे पहले यह देखना होगा कि किसी भी निर्णय के पीछे पारदर्शिता कितनी है। क्या नेता अपने फैसले के कारणों को स्पष्ट रूप से जनता के सामने रख रहा है। दूसरा, यह समझना जरूरी है कि उस निर्णय से आम जनता को क्या लाभ होगा। अगर कोई कदम कुछ व्यक्तियों को लाभ पहुंचाता है, तो वह जनहित का नहीं हो सकता।
तीसरा और सबसे अहम बिंदु है निरंतरता। जो व्यक्ति या नेता अपने विचारों और मूल्यों में स्थिर रहता है, वही भरोसे के योग्य होता है। बार-बार बदलती राहें यह संकेत देती हैं कि लक्ष्य स्पष्ट नहीं है, और जहां लक्ष्य ही स्पष्ट न हो, वहां मंजिल की उम्मीद करना व्यर्थ है।
आज जरूरत इस बात की है कि राजनीति फिर से मूल्यों और सिद्धांतों की ओर लौटे। और उससे भी ज्यादा जरूरी है कि जनता जागरूक होकर हर निर्णय को परखे, सवाल करे और सही-गलत की पहचान खुद करे। क्योंकि अंततः लोकतंत्र में वही रास्ता सही होता है, जो सत्ता तक ही नहीं, समाज के समग्र विकास तक भी पहुंचता है।
इसलिए राह वही चुनिए, जो सिद्धांतों पर टिकी हो, क्योंकि स्वार्थ की राह भले ही आसान लगे, लेकिन वह कभी स्थायी नहीं होती।
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डॉ. नीरज गजेंद्र
लेखक
डॉ. नीरज गजेंद्र
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