सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) से जुड़े एक अहम
मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि धर्म परिवर्तन करने वाला
व्यक्ति SC का दर्जा खो देता है। अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई या
अन्य धर्म अपनाता है, वह अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं रहेगा और उसे इससे
जुड़े किसी भी लाभ का अधिकार नहीं होगा।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस ए.वी. अंजारिया शामिल थे, ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों तक सीमित है। अदालत ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति न केवल SC का दर्जा खो देता है, बल्कि वह SC/ST Act 1989 के तहत मिलने वाले कानूनी संरक्षण का दावा भी नहीं कर सकता।
हाई कोर्ट के फैसले को मिली मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई
कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि हिंदू धर्म से
ईसाई धर्म में परिवर्तित व्यक्ति SC श्रेणी में नहीं आता। यह मामला पादरी चिंथदा आनंद की याचिका से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने SC/ST एक्ट के तहत मामला
दर्ज कराया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने उनकी FIR को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि धर्म
परिवर्तन के बाद वे SC के सदस्य नहीं रहे।
क्या था पूरा मामला?
पादरी चिंथदा आनंद ने कुछ लोगों पर
जातिगत भेदभाव और दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था। इस पर SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज
हुआ था। लेकिन जब मामला हाई कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ईसाई
धर्म अपना चुके हैं, इसलिए वे SC/ST कानून के तहत संरक्षण के पात्र नहीं
हैं। इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिसे अब खारिज कर दिया गया।
फैसले का असर
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट हो
गया है कि धर्म परिवर्तन का सीधा असर सामाजिक और कानूनी अधिकारों पर पड़ता है। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनेगा और SC/ST से जुड़े लाभों की
पात्रता को लेकर स्पष्टता प्रदान करेगा।
