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अलविदा सुरों की मल्लिका आशा
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आशा भोसले : सुरों की वह नदी, जो आठ दशकों तक संगीत प्रेमियों के दिलों में बहती रही

आठ दशक, एक लंबा समय। लेकिन आशा भोसले के लिए यह केवल समय नहीं था, यह एक निरंतर बहती हुई सुरों की नदी थी। 12 हजार से अधिक गीत, 20 से ज्यादा भाषाएं, अनगिनत रंग और भावनाएं। यह सिर्फ उपलब्धि नहीं, यह संवेदनाओं का महासागर है, जिसमें हर पीढ़ी ने अपने हिस्से की खुशियां, दर्द और प्रेम खोजा। ‘दम मारो दम’ की बेपरवाही, ‘इन आंखों की मस्ती’ की नजाकत, ‘पिया तू अब तो आजा’ की शरारत, हर गीत में उन्होंने सिर्फ शब्द नहीं गाए, उन्होंने जिंदगी को स्वर दिया।

डॉ. नीरज गजेंद्र
प्रकाशित: 12 Apr 2026, 06:13 PM · अपडेट: 18 Sep 2026, 03:32 AM
छत्तीसगढ़
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

भारतीय संगीत की आत्मा जैसे आज थोड़ी खाली हो गई है। आशा भोसले का जाना एक महान गायिका की विदाई नहीं है, यह उस युग का अंत है जिसने सुरों को सांसों की तरह जिया, महसूस किया और हर दिल तक पहुंचाया। मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में 92 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली, लेकिन सच यही है कि कुछ आवाजें कभी जाती नहीं हैं। वे समय की दीवारों से टकराकर लौटती हैं, यादों में ठहर जाती हैं और हर उस पल में सुनाई देती हैं, जब कोई दिल धड़कता है और कोई गीत जन्म लेता है। उनकी आवाज अब भी कहीं गूंज रही है। शायद किसी पुराने रेडियो की खनक में, किसी शाम की खामोशी में, या किसी अकेले मन के भीतर, जो अपने ही एहसासों से संवाद कर रहा हो। जब कोई महान कलाकार जाता है, तो वह केवल स्मृतियां नहीं छोड़ता, वह समय को बदल देता है। आशा भोसले के जाने के बाद संगीत पहले जैसा नहीं रहेगा, लेकिन उनकी आवाज हमेशा रहेगी। वह हर उस गीत में जीवित रहेंगी, जिसे हम सुनते हैं। हर उस एहसास में, जिसे हम महसूस करते हैं। उनकी विदाई एक गहरा शोक है, लेकिन उनकी विरासत एक अनंत उत्सव। क्योंकि कुछ आवाजें खत्म नहीं होतीं, वे बस अनंत में विलीन हो जाती हैं, और फिर वहीं से हमेशा के लिए गूंजती रहती हैं।

सुरों की वह नदी, जो आठ दशकों तक बहती रही

आठ दशक, एक लंबा समय। लेकिन आशा भोसले के लिए यह केवल समय नहीं था, यह एक निरंतर बहती हुई सुरों की नदी थी। 12 हजार से अधिक गीत, 20 से ज्यादा भाषाएं, अनगिनत रंग और भावनाएं। यह सिर्फ उपलब्धि नहीं, यह संवेदनाओं का महासागर है, जिसमें हर पीढ़ी ने अपने हिस्से की खुशियां, दर्द और प्रेम खोजा। ‘दम मारो दम’ की बेपरवाही, ‘इन आंखों की मस्ती’ की नजाकत, ‘पिया तू अब तो आजा’ की शरारत, हर गीत में उन्होंने सिर्फ शब्द नहीं गाए, उन्होंने जिंदगी को स्वर दिया। 1933 में जन्मी वह छोटी सी बच्ची, जिसके सिर से बचपन में ही पिता दीनानाथ मंगेशकर का साया उठ गया, उसने जीवन को बहुत जल्दी समझ लिया था। 10 साल की उम्र में गाया गया पहला गीत केवल शुरुआत नहीं था, वह एक संकल्प था कि अब यह आवाज घर भी संभालेगी और दुनिया भी जीतेगी। संघर्ष उनके साथ था, लेकिन उन्होंने उसे कभी बोझ नहीं बनने दिया। उन्होंने उसे अपनी ताकत बना लिया।

अस्वीकार से अमरता तक की यात्रा

हर महान आवाज को एक दिन दुनिया ठुकराती है। आशा भोसले भी इससे अछूती नहीं रहीं। कभी उनकी आवाज को ‘अयोग्य’ कहा गया, कभी उन्हें दूसरे दर्जे के मौके दिए गए। लेकिन वही आवाज आगे चलकर इतिहास की सबसे अधिक रिकॉर्ड की गई आवाजों में शामिल हुई। यह केवल सफलता नहीं, यह उस जिद की जीत थी, जो हर अस्वीकार को चुनौती देती है। पद्म भूषण, पद्म विभूषण, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, राष्ट्रीय सम्मान और गिनीज रिकॉर्ड, यह सब उनकी उपलब्धियों के पड़ाव हैं, मंजिल नहीं। उनकी असली पहचान उन पुरस्कारों में नहीं, बल्कि उन अनगिनत दिलों में है, जहां उनकी आवाज हमेशा के लिए बस गई है।

हर दौर में नई, हर एहसास में अपनी

उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि वे कभी एक जैसी नहीं रहीं, लेकिन हमेशा अपनी रहीं। लता मंगेशकर के साथ तुलना के दौर से निकलकर उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। आर डी बर्मन के साथ उनकी जुगलबंदी ने संगीत को नई दिशा दी। गजल से कैबरे, शास्त्रीय से पॉप, हर शैली में उन्होंने अपने स्वर की ऐसी छाप छोड़ी कि समय भी उसे मिटा नहीं सका। उनकी आवाज उम्र से परे थी। वह 20 साल की नायिका के लिए भी उतनी ही ताजगी से गाती थी, जितनी किसी परिपक्व किरदार के लिए गहराई से। उनका जीवन केवल रोशनी नहीं था, उसमें कई अंधेरे भी थे। टूटता विवाह, बिखरते रिश्ते, निजी जीवन के घाव, और फिर अपनों को खोने का दर्द। लेकिन हर बार उन्होंने खुद को समेटा और फिर से खड़ी हो गईं। उन्होंने यह सिखाया कि कलाकार केवल मंच पर नहीं बनता, वह जीवन की हर चोट में गढ़ा जाता है।

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