संपादकीय
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साइकिल में सरकार : देश को दिखावटी नहीं ईमानदार पहल की जरूरत
देश में आर्थिक दबावों के बीच ईंधन बचाने, सादगी अपनाने और अनावश्यक खर्च कम करने जैसे संदेश लगातार दिए जा रहे हैं। नेता और अधिकारी साइकिल चलाकर प्रतीकात्मक रूप से बचत और संयम का संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन जब उनके पीछे सुरक्षा और वाहनों का लंबा काफिला चलता है, तब यह दृश्य जनता के मन में कई सवाल भी खड़े करता है। कलमकार ने अपने इस विचारोत्तेजक लेख के माध्यम से इसी विरोधाभास को केंद्र में रखकर लिखते हैं कि अर्थव्यवस्था प्रतीकात्मक उपायों से नहीं सुधरती, ठोस नीतियों, उत्पादन, रोजगार और पारदर्शिता से मजबूत होती है।
डॉ. नीरज गजेंद्र : सूर्यवंशम से शादी में जरूर आना तक त्याग, सफलता और बदलते रिश्ते की कहानी
गोंडा की एक सच्ची घटना इन दिनों चर्चा में है, जहां एक मजदूर पति ने अपनी पत्नी को एएनएम बनाने के लिए मजदूरी की, मवेशी और फसल तक बेच दी, लेकिन नौकरी लगने के बाद पत्नी ने साथ रहने से इनकार कर दिया। यह घटना बदलते रिश्तों और समाज की सोच पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। लेख में इस घटना की तुलना “सूर्यवंशम” और “शादी में जरूर आना” जैसी फिल्मों से करते हुए बताया गया है कि सफलता के बाद रिश्तों में सम्मान और संवेदनशीलता बची रहना कितना जरूरी है।
मलय बेनर्जी का लिखा : मनुष्य होने की योग्यता और समाज का बदलता चेहरा
लेखक ने बंगाल की सामाजिक परिस्थितियों के माध्यम से मनुष्यता, संस्कार और हिंसा पर गहन विचार व्यक्त किए हैं। उनके अनुसार खेल मानव की हिंसक प्रवृत्तियों का रचनात्मक रूपांतरण है, लेकिन जब यही खेल उन्माद और राजनीति का माध्यम बन जाता है, तब समाज में अमानुषिकता और हिंसा बढ़ने लगती है।