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डॉ. नीरज गजेंद्र
डॉ. नीरज गजेंद्र
संपादकीय

 डॉ. नीरज गजेंद्र :  सूर्यवंशम से शादी में जरूर आना तक त्याग, सफलता और बदलते रिश्ते  की कहानी

गोंडा की एक सच्ची घटना इन दिनों चर्चा में है, जहां एक मजदूर पति ने अपनी पत्नी को एएनएम बनाने के लिए मजदूरी की, मवेशी और फसल तक बेच दी, लेकिन नौकरी लगने के बाद पत्नी ने साथ रहने से इनकार कर दिया। यह घटना बदलते रिश्तों और समाज की सोच पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। लेख में इस घटना की तुलना “सूर्यवंशम” और “शादी में जरूर आना” जैसी फिल्मों से करते हुए बताया गया है कि सफलता के बाद रिश्तों में सम्मान और संवेदनशीलता बची रहना कितना जरूरी है।

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प्रकाशित: 09 May 2026, 11:30 AM · अपडेट: 27 Sep 2026, 05:35 AM
विचार मंच
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

गोंडा की खबर इन दिनों चर्चा में है। एक मजदूर पति ने अपनी पत्नी को पढ़ाने के लिए मजदूरी की, मवेशी बेचे, फसल बेची, बाहर जाकर पल्लेदारी की। पत्नी को एएनएम का कोर्स करवाया, उम्मीद थी कि नौकरी लगने के बाद घर में खुशहाली आएगी, परिवार मजबूत होगा, जीवन आसान होगा। लेकिन कहानी ने मोड़ ले लिया। नौकरी लगने के बाद पत्नी ने साथ रहने से इनकार कर दिया। अब मामला पुलिस और अधिकारियों तक पहुंच चुका है।

यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह बदलते समाज, बदलते रिश्तों और बदलती प्राथमिकताओं की कहानी भी है। इस घटना को सुनते ही लोगों को दो फिल्में याद आती हैं, पहली सूर्यवंशम और दूसरी शादी में जरूर आना। शायद आपने भी ये फिल्में देखी होंगी।

सूर्यवंशम फिल्म में हीरा ठाकुर अनपढ़ होता है। गांव के लोग उसका मजाक उड़ाते हैं। लेकिन वह अपनी पत्नी राधा की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देता। वह चाहता है कि उसकी पत्नी आगे बढ़े, सम्मान पाए। आखिरकार राधा कलेक्टर बनती है। लेकिन उस फिल्म की सबसे खूबसूरत बात यह थी कि नौकरी और पद मिलने के बाद भी रिश्ते की गरिमा नहीं टूटी।

राधा कभी यह नहीं भूलती कि उसकी सफलता के पीछे उसके पति का त्याग है। हीरा ठाकुर भी कभी अहंकार नहीं करता कि मैंने तुम्हें बनाया। दोनों के बीच सम्मान बना रहता है। यही भारतीय परिवार व्यवस्था की असली ताकत थी। यहां पति-पत्नी प्रतियोगी नहीं, सहयोगी माने जाते थे। एक गिरता था तो दूसरा संभालता था। एक कमजोर होता था तो दूसरा ताकत बनता था।

दूसरी ओर शादी में जरूर आना फिल्म की कहानी बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाती है। वहां लड़की की सरकारी नौकरी लगती है और शादी के मंडप से ही रिश्ता टूट जाता है। नौकरी और करियर उसके लिए रिश्ते से बड़ा हो जाता है। आज समाज में ऐसे उदाहरण बढ़ते दिख रहे हैं। हर मामला एक जैसा नहीं होता, हर कहानी के पीछे अलग सच्चाई होती है, लेकिन एक सवाल जरूर उठता है, क्या सफलता मिलने के बाद रिश्तों का मूल्य कम हो जाता है।

क्या पढ़ाई और नौकरी इंसान को बड़ा बनाती है या फिर संवेदनशील बनाती है। अगर तरक्की के बाद इंसान अपने संघर्ष के दिनों को भूल जाए, उन लोगों को भूल जाए जिन्होंने उसका साथ दिया, तो फिर वह सफलता कितनी सार्थक है। गोंडा के इस मामले में सबसे दर्दनाक बात यह नहीं कि पति गरीब था। दर्द इस बात का है कि उसने उम्मीद से ज्यादा भरोसा किया। उसने सोचा कि संघर्ष के दिन खत्म होंगे तो परिवार और मजबूत होगा। लेकिन अब वही व्यक्ति न्याय के लिए दफ्तरों के चक्कर लगा रहा है।

भारतीय संस्कृति हमेशा से त्याग और कृतज्ञता की बात करती रही है। रामायण में भगवान राम राजकुमार होते हुए भी वन चले जाते हैं, क्योंकि उनके लिए रिश्तों और वचन का मूल्य सत्ता से बड़ा था। महाभारत में कर्ण दानवीर कहलाते हैं क्योंकि उन्होंने जीवनभर उपकार और निष्ठा को महत्व दिया।

धर्म सिर्फ पूजा-पाठ का नाम नहीं है। धर्म का असली अर्थ कर्तव्य और संवेदना है, जिसने कठिन समय में साथ दिया, उसके प्रति सम्मान रखना भी धर्म है।

यह भी सच है कि हर महिला को पढ़ने और आगे बढ़ने का पूरा अधिकार है। आत्मनिर्भर होना गलत नहीं, बल्कि जरूरी है। समाज तभी मजबूत होगा जब महिलाएं शिक्षित और सक्षम होंगी। लेकिन आत्मनिर्भरता का मतलब यह नहीं कि पुराने रिश्तों को बोझ मान लिया जाए।

उसी तरह यह भी जरूरी है कि पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे का सम्मान करें। सिर्फ आर्थिक स्थिति किसी इंसान की कीमत तय नहीं करती। गांव का मजदूर भी उतना ही सम्मान का हकदार है जितना किसी बड़े पद पर बैठा व्यक्ति।

आज सोशल मीडिया के दौर में लोग जल्दी फैसले कर लेते हैं। किसी एक पक्ष को सही और दूसरे को गलत मान लेते हैं। जबकि हर रिश्ते की सच्चाई सिर्फ वही लोग जानते हैं जो उसे जी रहे होते हैं। लेकिन समाज को इस घटना से एक सीख जरूर लेनी चाहिए।

असल में इंसान की पहचान उसके पद से नहीं, उसके व्यवहार से होती है। नौकरी, पैसा और प्रतिष्ठा जीवन को आसान बना सकते हैं, लेकिन रिश्तों की गर्माहट नहीं खरीद सकते।

अगर सफलता मिलने के बाद इंसान अपने संघर्ष के साथी को भूल जाए, तो वह सफलता अधूरी है। और अगर कठिन परिस्थितियों में भी कोई अपने रिश्तों को निभाए, तो वही असली जीत है।

सूर्यवंशम इसलिए आज भी लोगों के दिल में है क्योंकि उसमें त्याग के साथ सम्मान था। शादी में जरूर आना इसलिए याद रहती है क्योंकि उसमें महत्वाकांक्षा और रिश्तों के टकराव की सच्चाई थी। गोंडा की यह घटना भी समाज के सामने वही सवाल रख रही है। क्या हम आगे बढ़ते-बढ़ते उन लोगों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं जिन्होंने हमें आगे बढ़ाया।

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