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डॉ समरेन्द्र शर्मा
डॉ समरेन्द्र शर्मा
संपादकीय

सरकार चुनने वाली आधी आबादी अब सत्ता में हिस्सेदारी की ओर

महिलाएं अब सिर्फ वोट बैंक नहीं, सत्ता में भागीदार बनने की ओर बढ़ रही हैं। महिला आरक्षण से संसद और विधानसभाओं में उनकी भागीदारी बढ़ सकती है। हालांकि असली सशक्तिकरण तभी होगा, जब महिलाओं को केवल सीट नहीं, बल्कि नीति और फैसले लेने की वास्तविक शक्ति भी मिले।

कीर्तिमान ब्यूरो
कीर्तिमान ब्यूरो
18 Aug 2026, 11:26 AM
रायपुर

डॉ समरेन्द्र शर्मा 
प्रधानमंत्री का लाल किले से दिया गया संदेश कि क्रेडिट ले लीजिए, लेकिन माताओं-बहनों को उनका अधिकार लेने दीजिए सुनने में एक राजनीतिक अपील जैसी लगती है, लेकिन इसके पीछे भारतीय राजनीति में हो रहे एक बड़े बदलाव को पढ़ा जा सकता है।
महिला आरक्षण केवल सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं है। यह सत्ता का सवाल है। यह प्रतिनिधित्व का सवाल है और सबसे बढ़कर यह इस सवाल से जुड़ा है कि आने वाले बरसो में भारतीय राजनीति में महिलाएं केवल वोट देने वाली शक्ति रहेंगी या नीति बनाने वाली शक्ति भी बनेंगी? पिछले कुछ वर्षों में चुनावों में महिलाओं का महत्व लगातार बढ़ा है। राजनीतिक पार्टियों ने महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा, गैस, आवास, स्वास्थ्य योजनाओं और सीधे बैंक खाते में पैसे पहुंचाने जैसी योजनाओं को चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। हाल के वर्षों में महिलाओं को सीधे नकद हस्तांतरण कई राज्यों में तेजी से बढ़े हैं। 
इसका सीधा मतलब यह ही निकलता है कि राजनीति ने पहले महिलाओं को लाभार्थी के रूप में पहचाना। अब महिला आरक्षण उसे नीति-निर्माता बनाने का रास्ता खोलता है। यही इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पक्ष है। हमारे चुनावों में लंबे समय तक यह धारणा रही कि परिवार का राजनीतिक निर्णय पुरुष करता है और महिला उसी के अनुरूप मतदान करती है। यह तस्वीर तेजी से बदली है। महिलाओं की चुनावी भागीदारी बढ़ी है। कई राज्यों में महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों के बराबर या उससे अधिक रहा है। कई चुनावों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से काफी अधिक रहना यह बताता है कि महिला मतदाता अब चुनावी गणित का निर्णायक हिस्सा बन चुकी है।
इस बदलाव ने राजनीतिक दलों को एक नया संदेश दिया है कि महिलाओं को नजरअंदाज करके चुनाव जीतना पहले जितना आसान नहीं रहा। इसलिए महिला केंद्रित योजनाएं बढ़ीं, लेकिन यहीं से राजनीति का अगला चरण शुरू होता है। यदि महिला एक महत्वपूर्ण मतदाता है तो उसे केवल चुनाव से पहले लाभार्थी बनाकर क्यों रखा जाए? उसे संसद में सीट क्यों न मिले? उसे नीति बनाने का अवसर क्यों न मिले? 
हालांकि महिला केंद्रित नकद योजनाओं को केवल वोट खरीदने के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा। कई मामलों में सीधे बैंक खाते में आने वाला पैसा महिला की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ाता है। उसके पास अपना पैसा होने से परिवार के भीतर उसकी सौदेबाजी की क्षमता बढ़ सकती है। कुछ अध्ययनों और विश्लेषणों ने ऐसे हस्तांतरणों को महिलाओं की आर्थिक एजेंसी और राजनीतिक भागीदारी से भी जोड़ा है।
लेकिन दूसरा पक्ष भी है। जब लगभग हर राजनीतिक दल चुनाव में महिलाओं के खाते में पैसा भेजने या ऐसी योजनाओं का वादा करने लगे, तो महिला को नागरिक से ज्यादा टारगेट वोटर्स के रूप में देखने का खतरा पैदा होता है। राजनीति भी कहा जा सकता है कि आपको पैसा दिया, इसलिए हमें वोट दीजिए। यह सशक्तिकरण का पूरा अर्थ नहीं है। सशक्त महिला वह नहीं है जिसे केवल सरकार से सहायता मिले। सशक्त महिला वह है जो यह तय करने की स्थिति में हो कि किसे वोट देना है, कौन कानून बनाएगा, कौन बजट तय करेगा,किस नीति का समर्थन करना है और किस सरकार से जवाब मांगना है।
इस अर्थ में महिला आरक्षण नकद लाभ की राजनीति से आगे की छलांग हो सकता है। लिहाजा, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह व्यवस्था तुरंत लागू तो नहीं हो पाई। इसके क्रियान्वयन को जनगणना और उसके बाद परिसीमन से जोड़ा गया है। 2026 में सरकार ने परिसीमन और महिला आरक्षण को आगे बढ़ाने के लिए नए विधायी प्रस्ताव भी रखे हैं। 
मौजूदा दौर में भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी जरूर है, लेकिन प्रतिनिधित्व अभी भी पुरुषों की तुलना में बहुत कम है। आंकड़े बताते हैं कि अभी भी देश की लगभग आधी आबादी संसद में अभी भी आधी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं करती। यहां महिला आरक्षण का तर्क मजबूत दिखाई देता है। राजनीतिक दल स्वेच्छा से पर्याप्त महिलाओं को टिकट नहीं दे रहे हैं तो संवैधानिक आरक्षण एक रास्ता हो सकता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या संख्या बढ़ने से वास्तविक शक्ति भी बढ़ेगी? यहीं बहस जटिल हो जाती है। महिला सांसद बढ़ेंगी, लेकिन क्या निर्णय भी महिलाएं लेंगी? मान लीजिए संसद में महिलाओं की संख्या एक-तिहाई हो गई। क्या इसका अर्थ यह होगा कि महिला संबंधी मुद्दों पर कानून बेहतर होंगे? संभवतः हां लेकिन इसकी गारंटी नहीं है। क्योंकि किसी सांसद का महिला होना उसे अपने आप महिला अधिकारों का विशेषज्ञ या स्वतंत्र नीति-निर्माता नहीं बना देता। वह जिस पार्टी से आती है, उसकी विचारधारा और पार्टी अनुशासन के भीतर काम करेगी। इसलिए महिला आरक्षण का असली मूल्य केवल इस बात में नहीं होगा कि कितनी महिलाएं संसद में पहुंचीं। मूल्य इस बात में होगा कि वे कितनी स्वतंत्रता से बोलती हैं, कितनी समितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, कितने महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालती हैं और नीति निर्माण में कितना प्रभाव डालती हैं। सिर्फ संख्या बदलने से राजनीति की संस्कृति नहीं बदलती, लेकिन संख्या बदलना संस्कृति बदलने की पहली शर्त जरूर हो सकता है।
महिला आरक्षण को लेकर हमारे पास एक महत्वपूर्ण स्थानीय निकायों का प्रयोग पहले से है। पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण ने लाखों महिलाओं को राजनीतिक प्रक्रिया में प्रवेश दिया। इसके परिणामों को लेकर तस्वीर मिश्रित है। कहीं महिलाओं ने वास्तविक नेतृत्व किया। कहीं परिवार के पुरुष सदस्यों ने उनकी जगह निर्णय लेने की कोशिश की। जिसे आम भाषा में सरपंच पति या पार्षद पति जैसी प्रवृत्ति कहा गया, वह इसी समस्या का उदाहरण है, लेकिन केवल इस आधार पर आरक्षण को असफल कहना भी गलत होगा। क्योंकि पहली पीढ़ी की महिला प्रतिनिधि के लिए राजनीति में प्रवेश स्वयं एक बड़ा परिवर्तन है। जो महिला पहले ग्रामसभा में बोलने में संकोच करती थी, वह धीरे-धीरे प्रशासनिक प्रक्रिया, बजट, सरकारी योजनाओं और स्थानीय राजनीति को समझ सकती है।
महिला आरक्षण का सबसे बड़ा प्रभाव शायद तत्काल दिखाई न दे। आज किसी राजनीतिक परिवार की महिला को टिकट मिल सकता है। कल किसी सामान्य परिवार की महिला पार्टी संगठन में आगे आ सकती है। फिर उसके सामने चुनाव लड़ने का अवसर आ सकता है। फिर एक समय ऐसा भी आ सकता है जब महिला उम्मीदवार को टिकट देना किसी राजनीतिक दल के लिए विशेष प्रयोग नहीं बल्कि सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया बन जाए। यही आरक्षण की सबसे बड़ी संभावित उपलब्धि होगी कि महिलाओं की राजनीतिक उपस्थिति को अपवाद से सामान्य बनाना।
अब यह सवाल उठता है कि क्या यह राजनीतिक रणनीति भी है? निश्चित रूप से इसका राजनीतिक पक्ष है। इसे नकारना भी वास्तविकता से आंखें बंद करना होगा। जब महिला मतदाता चुनावों में निर्णायक हो रही हैं, जब उनके लिए प्रत्यक्ष लाभ योजनाएं राजनीतिक रूप से प्रभावी साबित हो रही हैं और जब सभी बड़े राजनीतिक दल महिला मतदाताओं को गंभीरता से ले रहे हैं, तब महिला आरक्षण का राजनीतिक महत्व स्वाभाविक है। लेकिन किसी नीति के राजनीतिक लाभ होने से वह नीति अपने आप गलत नहीं हो जाती। लगभग हर बड़ी नीति का राजनीतिक प्रभाव होता है। सड़क बनाना राजनीतिक लाभ दे सकता है। गरीबों के लिए योजना राजनीतिक लाभ दे सकती है। किसानों को सहायता राजनीतिक लाभ दे सकती है। फिर महिला आरक्षण भी राजनीतिक लाभ देगा। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि इससे किस पार्टी को फायदा होगा? बल्कि यह होना चाहिए कि क्या इससे लोकतंत्र और महिलाओं को दीर्घकालीन फायदा होगा? अगर दोनों साथ होते हैं तो इसमें समस्या क्या है? क्या इसका सबसे बड़ा लाभ भाजपा को होगा?
यह संभव है कि महिला आरक्षण की राजनीतिक कहानी का लाभ सत्तारूढ़ दल लेने की कोशिश करे। प्रधानमंत्री का क्रेडिट ले लीजिए वाला संदेश भी इसी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा माना जा सकता है। सरकार चाहती है कि महिला मतदाता इसे उसके नेतृत्व की उपलब्धि के रूप में देखें। लेकिन यहां एक दिलचस्प उलटा समीकरण भी है। आरक्षण लागू होने के बाद सबसे ज्यादा महिला उम्मीदवार किस पार्टी से आएंगी, यह पहले से तय नहीं है। जिस पार्टी के पास बेहतर महिला संगठन, स्थानीय महिला नेतृत्व और योग्य उम्मीदवारों का बड़ा आधार होगा, उसे फायदा मिलेगा। इसलिए महिला आरक्षण किसी एक पार्टी की स्थायी संपत्ति नहीं बन सकता। आज इसका राजनीतिक श्रेय कोई ले सकता है। कल इसका लाभ कोई दूसरा दल उठा सकता है।
आरक्षण संसद तक पहुंचने का रास्ता खोल सकता है, लेकिन संसद तक पहुंचने से पहले ही महिलाओं की राजनीति में कई बाधाएं हैं। जैसे पैसे की कमी, राजनीतिक नेटवर्क का अभाव, परिवार और सामाजिक दबाव, सुरक्षा संबंधी समस्याएं,राजनीतिक दलों में पुरुष वर्चस्व और चुनाव लड़ने की अत्यधिक लागत। यदि इन समस्याओं पर काम नहीं हुआ तो संभव है कि आरक्षित सीटों पर भी मुख्यतः राजनीतिक परिवारों की महिलाएं आगे आएं। तब संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, लेकिन राजनीतिक अवसरों का लोकतंत्रीकरण सीमित रह जाएगा। इसलिए असली सुधार केवल आरक्षण नहीं होना चाहिए। राजनीतिक दलों के भीतर महिला नेतृत्व तैयार करना भी जरूरी है।

संसद में एक-तिहाई महिलाओं की मौजूदगी तीन बड़े बदलाव ला सकती है। पहला राजनीति में महिलाओं की सामान्य दृश्यता बढ़ेगी। दूसरा युवा लड़कियों को राजनीति एक पुरुष-प्रधान क्षेत्र के बजाय संभावित करियर और सार्वजनिक सेवा के क्षेत्र के रूप में दिखाई देगी। तीसरा महिला संबंधी मुद्दे राजनीतिक प्राथमिकता में अधिक मजबूती से आ सकते हैं। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी होगा कि महिला सांसदों को केवल महिला मुद्दों तक सीमित न कर दिया जाए। महिला सांसद वित्त, रक्षा, विदेश नीति, उद्योग, कृषि, गृह, तकनीक और अर्थव्यवस्था पर भी उतनी ही निर्णायक भूमिका निभाएं। महिला सशक्तिकरण का अर्थ यह नहीं कि महिलाएं केवल महिलाओं के मुद्दे उठाएं। अर्थ यह है कि महिलाएं देश के हर मुद्दे पर निर्णय लेने की समान भागीदार बनें।
भारतीय राजनीति शायद एक दिलचस्प परिवर्तन के दौर में है। एक तरफ महिला के बैंक खाते में पैसा पहुंच रहा है। दूसरी तरफ महिला को संसद में सीट देने की बात हो रही है। पहला कदम उसे आर्थिक रूप से कुछ स्वतंत्र बना सकता है। दूसरा कदम उसे राजनीतिक रूप से शक्तिशाली बना सकता है। लेकिन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। पैसा सरकार देती है। राजनीतिक अधिकार संविधान देता है। पैसा किसी चुनावी योजना के साथ बढ़ या घट सकता है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व संस्थागत शक्ति पैदा कर सकता है। इसलिए अगर महिला राजनीति को केवल लाभार्थी से निर्णयकर्ता की ओर ले जाने का यह परिवर्तन सफल होता है, तो इसका प्रभाव किसी एक चुनाव से कहीं अधिक बड़ा होगा।
फिर भी एक सावधानी जरूरी है। महिला आरक्षण को महिलाओं के सभी सवालों का समाधान मान लेना गलत होगा। संसद में 33 प्रतिशत महिलाएं होने के बावजूद यदि महिला श्रमबल भागीदारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा, संपत्ति के अधिकार और समान वेतन जैसे मुद्दों पर पर्याप्त सुधार नहीं हुआ तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व अधूरा रहेगा। महिला की वास्तविक शक्ति केवल संसद की सीट से तय नहीं होती। वह इस बात से भी तय होती है कि उसके पास शिक्षा कितनी है, आय कितनी है, संपत्ति पर अधिकार कितना है, अपने जीवन के फैसलों पर नियंत्रण कितना है और हिंसा व भेदभाव से सुरक्षा कितनी है। इसलिए महिला आरक्षण को व्यापक महिला सशक्तिकरण की एक कड़ी मानना चाहिए, पूरी श्रृंखला नहीं।
महिला आरक्षण का प्रभाव केवल महिलाओं पर नहीं पड़ेगा। पुरुष राजनीतिक नेताओं को भी अपनी राजनीति बदलनी पड़ेगी। महिला मतदाताओं को केवल लाभ देने की राजनीति पर्याप्त नहीं होगी। महिला नेताओं के साथ काम करना पड़ेगा। पार्टी संगठन में महिलाओं को वास्तविक जिम्मेदारी देनी पड़ेगी। टिकट वितरण में महिलाओं को जगह देनी पड़ेगी और धीरे-धीरे राजनीति की भाषा भी बदलेगी। यानी महिला आरक्षण सिर्फ संसद की सीटों का गणित नहीं बदलेगा। यह राजनीतिक शक्ति का सामाजिक संतुलन बदल सकता है।
कुल मिलाकर भारतीय राजनीति ने पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं की ताकत को बहुत करीब से पहचाना है। पहले महिला को परिवार की सदस्य के रूप में देखा जाता था। फिर वह एक महत्वपूर्ण मतदाता बनी। फिर वह लक्षित कल्याण योजनाओं की लाभार्थी बनी। अब उसे नीति-निर्माण की मेज पर बैठाने की तैयारी हो रही है। यह बदलाव केवल राजनीतिक चाल है, ऐसा कहना गलत होगा और यह केवल पवित्र अभियान है। ऐसा कहना भी राजनीति की वास्तविकता को नजरअंदाज करना होगा।
यह सामाजिक न्याय और राजनीतिक रणनीति दोनों का मेल माना जा सकता है। राजनीति महिलाओं को इसलिए महत्व दे रही है क्योंकि महिलाएं अब चुनावी रूप से निर्णायक हैं, लेकिन अगर उसी राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से महिलाओं को वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति भी मिलती है, तो इसमें लोकतंत्र का बड़ा लाभ छिपा है। इसलिए महिला आरक्षण की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि किस पार्टी ने इसका क्रेडिट लिया। सवाल यह होना चाहिए कि कितनी ऐसी महिलाएं संसद में पहुंचीं जो अपने बूते राजनीति में आईं? कितनी ने स्वतंत्र आवाज उठाई? कितनी ने महत्वपूर्ण नीतियां प्रभावित कीं? और क्या गांव की सामान्य महिला को भी लगा कि संसद में बैठी महिला वास्तव में उसकी आवाज है? यदि इसका उत्तर हां होता है तो महिला आरक्षण ऐतिहासिक होगा। तब चुनाव से पहले खाते में आया पैसा केवल तत्काल राहत नहीं रहेगा। वह उस लंबे सफर की पहली सीढ़ी होगा, जिसके अंतिम पड़ाव पर महिला केवल वोट देने वाली नहीं, देश की दिशा तय करने वाली होगी और शायद यही इस पूरे बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक अर्थ होगा कि महिलाओं को अब सिर्फ सत्ता तक पहुंचने के लिए वोट नहीं मांगा जा रहा बल्कि सत्ता में पहुंचकर निर्णय लेने का अधिकार देने की बात हो रही है। लेकिन यह वादा तभी पूरा माना जाएगा जब माताओं-बहनों का संबोधन चुनावी मंच से निकलकर संसद की निर्णय लेने वाली मेज तक पहुंचे।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं )
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