वजनी पहेली: रिकॉर्ड में निकला 141 ग्राम से ज्यादा का फर्क
पुलिस की जब्ती का रिकॉर्ड: 1280 गोलियों का वजन 153.06 ग्राम दर्ज किया गया।
मजिस्ट्रेट के सामने गिनती का रिकॉर्ड: न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष जांच और गिनती के दौरान इन्हीं गोलियों का वजन 294.98 ग्राम निकला।
केवल वजन में ही 141.92 ग्राम का बड़ा अंतर पाया गया। अदालत ने जब इस बाबत अभियोजन पक्ष से जवाब मांगा, तो पुलिस अधिकारी कोई संतोषजनक वजह नहीं बता सके।
FIR से पहले ही कागजों पर दर्ज हो गया था अपराध क्रमांक
पुलिस की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल कागजी कार्रवाई को लेकर उठा। आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक मामले की एफआईआर (अपराध क्रमांक 510/2024) 15 दिसंबर को शाम 5:21 बजे दर्ज की गई थी। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि घटनास्थल पर तैयार किए गए तौल पंचनामा, नमूना सील पंचनामा और जब्ती पत्रक में यह अपराध क्रमांक पहले से लिखा हुआ था। अदालत ने सवाल उठाया कि जब एफआईआर शाम को दर्ज हुई, तो उससे पहले ही मौके पर तैयार हुए कानूनी दस्तावेजों पर केस नंबर कैसे छप गया?स्वतंत्र गवाह मुकरे, अहम गवाहों को कोर्ट में लाया ही नहीं गया
जांच में लापरवाही का आलम यह रहा कि पुलिस ने जिन दो स्वतंत्र गवाहों—राधेश्याम और प्रदीप कुमार ठाकुर—को मौके पर मौजूद बताया था, उन्होंने भी अदालत में पुलिस की पूरी कार्रवाई का समर्थन नहीं किया।
इसके अलावा, पुलिस ने दो बेहद अहम कड़ियों को गवाह के तौर पर पेश ही नहीं किया:
वजन करने वाला व्यक्ति: जिसने मौके पर गोलियों की तोल की थी।
मालखाना मुंशी: जिसके पास जब्त माल सुरक्षित रखा गया था।
इन दोनों की गवाही न होने से बरामद माल की सुरक्षा और उसकी सीलिंग प्रक्रिया पूरी तरह संदिग्ध हो गई।
सैंपलिंग में देरी और सीनियर अफसरों को सूचना देने में अंतर
अदालत ने यह भी पाया कि पुलिस ने बरामद की गई सभी 61 पट्टियों से सैंपल नहीं लिए थे। इतना ही नहीं, नमूने लेने की पूरी प्रक्रिया में 4 दिनों का बड़ा अंतर देखने को मिला। मुखबिर से मिली गुप्त सूचना को वरिष्ठ अधिकारियों तक भेजने की प्रक्रिया में भी पुलिस के बयानों और लिखित दस्तावेजों में भारी अंतर मिला।बचाव पक्ष की दलील और अंतिम फैसला
मामले में आरोपी की ओर से अधिवक्ता ज्ञान प्रकाश दांडेकर ने पैरवी की। उन्होंने कोर्ट के सामने पुलिस की इन सभी 11 गंभीर गलतियों को प्रमुखता से रखा। दोनों पक्षों की दलीलें और पेश सबूतों को देखने के बाद विशेष अदालत ने माना कि पुलिस आरोपी के खिलाफ दोष साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही है। अदालत ने फैसले में साफ किया कि इतने संदेहों के बीच किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और बी. पवन कल्याण को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।

