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Court acquitted the accused ( Image Source - Keertiman Media )
Court acquitted the accused ( Image Source - Keertiman Media )
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Bhilai Drug Case: नशीली गोलियों की जब्ती मामले में बड़ा उलटफेर, पुलिस जांच में मिलीं 11 गंभीर खामियां, कोर्ट ने आरोपी को किया बरी

Bhilai Drug Case: भिलाई में नशीली गोलियों की बरामदगी के मामले में बी. पवन कल्याण को अदालत ने बरी कर दिया। पुलिस रिकॉर्ड में वजन का बड़ा अंतर, FIR से पहले अपराध क्रमांक दर्ज होने और गवाहों से जुड़ी कमियों समेत 11 खामियां सामने आईं।

अप्पू धीवर |  कीर्तिमान न्यूज
प्रकाशित: 03 Oct 2026, 04:16 PM · 4 मिनट पढ़ने का समय
भिलाई
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
Bhilai Drug Case: भिलाई नगर थाना क्षेत्र में नशीली गोलियों के साथ पकड़े गए आरोपी बी. पवन कल्याण को अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए बाइज्जत बरी कर दिया है। विशेष न्यायाधीश सुनीता टोप्पो की कोर्ट ने पुलिस की तफ्तीश में सामने आई 11 बड़ी कानूनी और तकनीकी खामियों के आधार पर यह फैसला सुनाया। कोर्ट में अभियोजन पक्ष न तो जब्ती की प्रक्रिया सही साबित कर पाया और न ही बरामदगी से जुड़े ठोस सबूत पेश कर सका।

वजनी पहेली: रिकॉर्ड में निकला 141 ग्राम से ज्यादा का फर्क 

इस पूरे केस में सबसे चौंकाने वाली बात नशीली गोलियों के वजन को लेकर सामने आई। पुलिस का दावा था कि 15 दिसंबर 2024 को सेक्टर-6 स्थित आयकर भवन के पास से आरोपी के कब्जे से अल्प्राजोलम की 1280 गोलियां (61 पट्टियां) बरामद की गई थीं।
  • पुलिस की जब्ती का रिकॉर्ड: 1280 गोलियों का वजन 153.06 ग्राम दर्ज किया गया।

  • मजिस्ट्रेट के सामने गिनती का रिकॉर्ड: न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष जांच और गिनती के दौरान इन्हीं गोलियों का वजन 294.98 ग्राम निकला।

केवल वजन में ही 141.92 ग्राम का बड़ा अंतर पाया गया। अदालत ने जब इस बाबत अभियोजन पक्ष से जवाब मांगा, तो पुलिस अधिकारी कोई संतोषजनक वजह नहीं बता सके।

FIR से पहले ही कागजों पर दर्ज हो गया था अपराध क्रमांक

पुलिस की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल कागजी कार्रवाई को लेकर उठा। आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक मामले की एफआईआर (अपराध क्रमांक 510/2024) 15 दिसंबर को शाम 5:21 बजे दर्ज की गई थी। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि घटनास्थल पर तैयार किए गए तौल पंचनामा, नमूना सील पंचनामा और जब्ती पत्रक में यह अपराध क्रमांक पहले से लिखा हुआ था। अदालत ने सवाल उठाया कि जब एफआईआर शाम को दर्ज हुई, तो उससे पहले ही मौके पर तैयार हुए कानूनी दस्तावेजों पर केस नंबर कैसे छप गया?

स्वतंत्र गवाह मुकरे, अहम गवाहों को कोर्ट में लाया ही नहीं गया

जांच में लापरवाही का आलम यह रहा कि पुलिस ने जिन दो स्वतंत्र गवाहों—राधेश्याम और प्रदीप कुमार ठाकुर—को मौके पर मौजूद बताया था, उन्होंने भी अदालत में पुलिस की पूरी कार्रवाई का समर्थन नहीं किया।

इसके अलावा, पुलिस ने दो बेहद अहम कड़ियों को गवाह के तौर पर पेश ही नहीं किया:

  1. वजन करने वाला व्यक्ति: जिसने मौके पर गोलियों की तोल की थी।

  2. मालखाना मुंशी: जिसके पास जब्त माल सुरक्षित रखा गया था।

इन दोनों की गवाही न होने से बरामद माल की सुरक्षा और उसकी सीलिंग प्रक्रिया पूरी तरह संदिग्ध हो गई।

सैंपलिंग में देरी और सीनियर अफसरों को सूचना देने में अंतर 

अदालत ने यह भी पाया कि पुलिस ने बरामद की गई सभी 61 पट्टियों से सैंपल नहीं लिए थे। इतना ही नहीं, नमूने लेने की पूरी प्रक्रिया में 4 दिनों का बड़ा अंतर देखने को मिला। मुखबिर से मिली गुप्त सूचना को वरिष्ठ अधिकारियों तक भेजने की प्रक्रिया में भी पुलिस के बयानों और लिखित दस्तावेजों में भारी अंतर मिला।

बचाव पक्ष की दलील और अंतिम फैसला 

मामले में आरोपी की ओर से अधिवक्ता ज्ञान प्रकाश दांडेकर ने पैरवी की। उन्होंने कोर्ट के सामने पुलिस की इन सभी 11 गंभीर गलतियों को प्रमुखता से रखा। दोनों पक्षों की दलीलें और पेश सबूतों को देखने के बाद विशेष अदालत ने माना कि पुलिस आरोपी के खिलाफ दोष साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही है। अदालत ने फैसले में साफ किया कि इतने संदेहों के बीच किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और बी. पवन कल्याण को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।

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