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श्रीमद्भागवत : वृंदावन के श्री प्रियाकांत जू मंदिर में देवकीनंदन ठाकुर की भागवत कथा, श्रद्धा और भक्ति का उमड़ा सैलाब
श्रीमद्भागवत : वृंदावन के श्री प्रियाकांत जू मंदिर में देवकीनंदन ठाकुर की भागवत कथा, श्रद्धा और भक्ति का उमड़ा सैलाब
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श्रीमद्भागवत : वृंदावन के श्री प्रियाकांत जू मंदिर में देवकीनंदन ठाकुर की भागवत कथा, श्रद्धा और भक्ति का उमड़ा सैलाब

श्री प्रियाकांत जू मंदिर में देवकीनंदन ठाकुर महाराज द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा वैशाख पूर्णिमा से शुरू होकर लगभग 9 दिनों तक चल रही है। इस धार्मिक आयोजन में देशभर से हजारों श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं। कथा में प्रतिदिन सुबह-शाम भजन, कीर्तन और प्रवचन हो रहे हैं, जिनमें भक्ति, कर्म, विनम्रता और आत्मिक शुद्धता का संदेश दिया जा रहा है। महाराज जी ने धर्म को केवल पूजा नहीं बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति बताया है और अहंकार को आध्यात्मिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा कहा है। वृंदावन का पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया है और यह आयोजन श्रद्धा, भक्ति और भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण संगम बन गया है।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 03 May 2026, 12:31 PM · अपडेट: 16 Sep 2026, 08:37 AM
रायपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
देवकीनंदन ठाकुर महाराज की श्रीमद्भागवत कथा इन दिनों उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद स्थित वृंदावन के श्री प्रियाकांत जू मंदिर (शांति सेवा धाम परिसर) में आयोजित की जा रही है। वैशाख पूर्णिमा के पावन अवसर पर शुरू हुआ यह भव्य धार्मिक आयोजन अब श्रद्धा और भक्ति का प्रमुख केंद्र बन गया है। यह कथा वृंदावन के प्रसिद्ध श्री प्रियाकांत जू मंदिर परिसर में चल रही है, जहाँ देशभर से हजारों श्रद्धालु पहुंचकर कथा श्रवण कर रहे हैं। पूरे परिसर को फूलों और भव्य सजावट से सुसज्जित किया गया है, जिससे वातावरण पूर्ण रूप से आध्यात्मिक बन गया है।
भागवत कथा वैशाख पूर्णिमा से लेकर लगभग 9 दिनों तक चलने वाली है । इस दौरान प्रतिदिन सुबह और शाम दो सत्रों में कथा एवं भजन-कीर्तन का आयोजन किया जा रहा है। अंतिम दिन विशेष पूर्णाहुति और भव्य भंडारे का आयोजन भी किया गया है।

भक्तों का उमड़ा सैलाब

कथा स्थल पर सुबह से ही “राधे-राधे” और “हरे कृष्ण” के जयघोष गूंज रहे हैं। दूर-दराज़ से आए श्रद्धालु पंडाल में बैठकर श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कर रहे हैं। भीड़ को देखते हुए प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने विशेष व्यवस्था की है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

कथा में मिल रहा आध्यात्मिक संदेश

श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज अपनी ओजस्वी वाणी में श्रीकृष्ण की लीलाओं, भक्ति मार्ग और जीवन के आध्यात्मिक मूल्यों पर प्रकाश डाल रहे हैं। उनके प्रवचनों में यह संदेश दिया जा रहा है कि भक्ति ही जीवन को सही दिशा देने का सर्वोत्तम मार्ग है।

वैशाख पूर्णिमा का विशेष महत्व

वैशाख पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर वृंदावन का यह आयोजन और भी विशेष हो गया है। इसे आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है, जिसके कारण श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। देश के विभिन्न राज्यों से आए भक्तों का कहना है कि इस कथा में शामिल होकर उन्हें मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव हो रहा है। कई श्रद्धालु इसे जीवन का अविस्मरणीय अनुभव बता रहे हैं। वृंदावन के श्री प्रियाकांत जू मंदिर में चल रही यह भागवत कथा न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि भारतीय संस्कृति और भक्ति परंपरा का जीवंत उदाहरण भी बन गई है। वैशाख पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर यह आयोजन श्रद्धा, भक्ति और अध्यात्म का अद्भुत संगम प्रस्तुत कर रहा है।
देवकीनंदन ठाकुर महाराज ने वृंदावन स्थित श्रीमद्भागवत कथा में धर्म को केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न मानकर उसे जीवन जीने की एक संपूर्ण पद्धति के रूप में समझाया। उनके अनुसार धर्म का वास्तविक अर्थ मन की शुद्धता, व्यवहार में ईमानदारी, विचारों की पवित्रता और हर जीव के प्रति करुणा में निहित है। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति अपने भीतर बदलाव नहीं लाता, तब तक बाहरी धार्मिक क्रियाएं अधूरी ही रहती हैं।

भक्ति और कर्म की उपासना 

उन्होंने भक्ति को केवल भावनात्मक प्रक्रिया नहीं बल्कि मन और आत्मा को स्थिर करने वाली आध्यात्मिक शक्ति बताया। उनके अनुसार “राधे-राधे” और श्रीकृष्ण नाम का स्मरण मन की अशांति को दूर कर व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है। भक्ति को उन्होंने जीवन की दिशा सुधारने वाली ऊर्जा के रूप में प्रस्तुत किया, जो व्यक्ति को अहंकार से मुक्त कर सही मार्ग की ओर ले जाती है। कर्म सिद्धांत पर भी गहराई से प्रकाश डाला और कहा कि मनुष्य का हर कर्म उसके भविष्य को प्रभावित करता है। 
अच्छे कर्म शांति और उन्नति का मार्ग खोलते हैं, जबकि गलत कर्म जीवन में अशांति और दुख का कारण बनते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता, वह किसी न किसी रूप में जीवन में परिणाम अवश्य देता है।

समाज और परिवार के प्रति कर्तव्य 

महाराज जी ने अहंकार को मानव जीवन की सबसे बड़ी बाधा बताया। उनके अनुसार अहंकार व्यक्ति को न केवल भगवान से दूर करता है, बल्कि उसे समाज और रिश्तों से भी अलग कर देता है। इसके विपरीत उन्होंने विनम्रता और समर्पण को आध्यात्मिक उन्नति का आधार बताया। साथ ही उन्होंने परिवार और समाज को धर्म की असली प्रयोगशाला बताया, जहाँ संस्कार, प्रेम और सम्मान के माध्यम से धर्म व्यवहार में उतरता है। उनके अनुसार यदि घर में अच्छे संस्कार होंगे तो समाज स्वतः ही मजबूत और संतुलित बनेगा। 
अंत में उन्होंने यह गूढ़ संदेश दिया कि ईश्वर को बाहर खोजने से अधिक महत्वपूर्ण उसे अपने भीतर अनुभव करना है। उनके अनुसार जब मनुष्य अपने भीतर झांकता है, तभी उसे वास्तविक शांति और आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती है।
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