बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शुक्रवार को नालंदा जिले के ऐतिहासिक परनावां धाम से राज्य की जनता को विकास और सुशासन का कड़ा संदेश दिया। सरमेरा प्रखंड के परनावां गांव स्थित बाबा महतो साहब की जन्मस्थली पर आयोजित राजकीय मेले का उद्घाटन करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की प्राथमिकता आम जनता और विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
बेटियों की सुरक्षा और 'पंचायत राज' पर जोर
मुख्यमंत्री ने कानून-व्यवस्था पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि पुलिस की मुस्तैदी तब तक कम नहीं होगी, जब तक राज्य की बेटियां स्कूल-कॉलेज से पूरी तरह सुरक्षित होकर घर नहीं लौट आतीं। इसके साथ ही, सरकारी सेवाओं को जनता के द्वार तक पहुँचाने के लिए उन्होंने एक बड़ी घोषणा की। 19 मई से राज्य की हर पंचायत में अधिकारी बैठेंगे, ताकि ग्रामीणों को अपनी समस्याओं के लिए शहरों की ओर न भागना पड़े और उनका समाधान स्थानीय स्तर पर ही संभव हो सके।
बाबा महतो साहब के नाम पर विकास की सौगात
धार्मिक आस्था के केंद्र परनावां धाम के महत्व को देखते हुए मुख्यमंत्री ने मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना की और राज्य की खुशहाली की कामना की। उन्होंने घोषणा की कि क्षेत्र के स्थानीय आईटीआई (ITI) और अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का नामकरण अब 'बाबा महतो साहब' के नाम पर किया जाएगा। मेले में उमड़ने वाली भीड़ को ध्यान में रखते हुए, सरकार भविष्य में भूमि अधिग्रहण कर मेले का विस्तार करेगी और मुख्य सड़क से मंदिर तक सीधी कनेक्टिविटी के लिए नई सड़क का निर्माण भी कराया जाएगा।
शिक्षा और रोजगार का 'महा-मिशन'
शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव का विजन साझा करते हुए सम्राट चौधरी ने कहा:
मॉडल स्कूल और कॉलेज: राज्य के सभी 534 प्रखंडों में उच्च गुणवत्ता वाले शिक्षण संस्थान बनाए जाएंगे। इनका स्तर इतना ऊंचा होगा कि अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी अपने बच्चों को वहां पढ़ाने में गर्व महसूस करेंगे।
रोजगार का लक्ष्य: सरकार का लक्ष्य साल 2030 तक एक करोड़ रोजगार के अवसर पैदा करना है। इसके लिए 5 लाख करोड़ रुपये के निवेश को धरातल पर उतारने की तैयारी चल रही है।
परनावां धाम: आस्था और चमत्कार की भूमि
करीब 800 साल पुराने इतिहास को समेटे यह धाम बाबा महतो साहब की तपोस्थली है। उन्होंने अपने जीवनकाल में पशुबलि और कर्मकांड जैसी कुरीतियों का विरोध कर "जियो और जीने दो" का संदेश दिया। जनश्रुतियों के अनुसार, उनकी साधना इतनी कठोर थी कि उन्होंने 12 वर्षों तक केवल करमी का साग खाकर तपस्या की। उनसे जुड़ी दीवार चलाने और टूटे शंख से ध्वनि निकालने जैसी चमत्कारिक कथाएं आज भी श्रद्धालुओं के बीच अटूट विश्वास का प्रतीक बनी हुई हैं।
