छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सिर्फ एक मरीज की पीड़ा नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी को उजागर करती है। 21वीं सदी में भी यहां एक लकवाग्रस्त युवक को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस नहीं, बल्कि खाट का सहारा लेना पड़ा।
मामला नारायणपुर-कांकेर सीमा से लगे बीनागुंडा गांव का है। यहां रहने वाले मर्रो पददा को तीन दिन पहले लकवा मार गया। परिवार ने सुबह 7 बजे से लगातार 108 एंबुलेंस सेवा को कॉल किया, लेकिन मदद नहीं मिली। जब सिस्टम ने जवाब दे दिया, तो गांव के लोग ही सहारा बने। करीब 20 ग्रामीणों ने मिलकर युवक को खाट में बांधा और 19 किलोमीटर लंबा पैदल सफर शुरू किया। रास्ता आसान नहीं था—पहाड़ी इलाके, पथरीले रास्ते और हर कदम पर खतरा। फिर भी इंसानियत ने हार नहीं मानी।
करीब 4 घंटे की कठिन यात्रा के बाद जब ये लोग छोटेबेठिया पहुंचे, तब जाकर कहीं राहत मिली। यहां BSF कैंप के जवानों ने मदद की और एंबुलेंस की व्यवस्था कर मरीज को अस्पताल पहुंचाया गया। इस घटना ने एक बार फिर इलाके की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं की कमी को उजागर कर दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि यहां 108 एंबुलेंस सेवा अक्सर ठप रहती है। गांव तक पक्की सड़क तक नहीं है, जिससे आपात स्थिति में मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या अंदरूनी गांवों में रहने वाले लोगों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं है? क्या सरकारी दावे सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे?
यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि अगर समय रहते व्यवस्थाओं को नहीं सुधारा गया, तो ऐसी तस्वीरें बार-बार सामने आती रहेंगी—जहां मरीज खाट पर और सिस्टम कागजों पर चलता नजर आएगा।

