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छत्तीसगढ़

दीदी के बखरी से बदली तस्वीर : कांकेर की 3,364 महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर, 25 हजार तक पहुंच रही मासिक आय

कांकेर जिला में “दीदी के बखरी” पहल के तहत महिलाएं सब्जी बाड़ी, मुर्गी पालन, मछली पालन और वनोपज संग्रहण से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। बिहान योजना के अंतर्गत 3364 महिलाएं इस मॉडल से जुड़ी हैं और हर महीने 20-25 हजार रुपए तक कमा रही हैं। आने वाले समय में 10,780 महिलाओं को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला सशक्तिकरण को मजबूती मिल रही है।

कांकेर जिला में “दीदी के बखरी” पहल के तहत सब्जी बाड़ी, मुर्गी और मछली पालन करती महिला किसान
कांकेर जिला में “दीदी के बखरी” पहल के तहत सब्जी बाड़ी, मुर्गी और मछली पालन करती महिला किसान
कीर्तिमान ब्यूरो
12 Apr 2026, 06:32 PM
📍 कांकेर

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिला में महिलाओं की आजीविका को नया आयाम देने वाली “दीदी के बखरी” पहल अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव बनती जा रही है। घर की बाड़ी से शुरू हुई यह छोटी पहल आज हजारों महिलाओं के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन चुकी है। सब्जी बाड़ी, मुर्गी पालन, मछली पालन और वनोपज संग्रहण से जुड़कर महिलाएं हर महीने 20 से 25 हजार रुपए तक की आय अर्जित कर रही हैं।

4 विकासखंडों में फैला मॉडल, 3364 महिलाएं जुड़ीं

जिले में बिहान योजना के तहत “दीदी के बखरी” को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह मॉडल नरहरपुर, कांकेर, भानुप्रतापपुर और चारामा विकासखंडों में लागू है।

  • नरहरपुर: 1200 महिलाएं
  • कांकेर: 790 महिलाएं
  • चारामा: 734 महिलाएं
  • भानुप्रतापपुर: 640 महिलाएं

कुल मिलाकर 3364 महिला किसान इससे जुड़कर अपनी आय बढ़ा रही हैं। वर्ष 2026-27 में 10,780 महिलाओं को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।

महिलाएं सब्जियां उगाकर स्थानीय बाजार में बेच रही

घर की बाड़ी बनी कमाई का साधन

महिलाएं अपने घर के आसपास की जमीन में सब्जियां उगाकर स्थानीय बाजार में बेच रही हैं। इसके साथ ही:

  • मुर्गी पालन
  • मछली पालन
  • बकरी पालन
  • वनोपज (महुआ, इमली, शहद) संग्रहण

जैसी गतिविधियों से अतिरिक्त आय भी कमा रही हैं।

केस स्टडी: ऐसे बदली जिंदगी

  • सुरेखा नेताम (रावस): ग्राफ्टेड सब्जियां उगाकर और मुर्गी पालन से नियमित आय कमा रही हैं।
  • नामिका यादव (ठेमा): वनोपज के साथ मछली और मुर्गी पालन से परिवार की आय बढ़ाई।
  • मोतिन दर्रो (हाटकर्रा): “पोल्ट्री-कम-फिश” मॉडल अपनाकर खर्च घटाया, मुनाफा बढ़ाया।
  • जमुना कोर्राम (धनेली): आजीविका डबरी के जरिए मछली पालन में सफलता हासिल की।
मुर्गी को दाना देती महिला

कम लागत में ज्यादा मुनाफा: पोल्ट्री-कम-फिश मॉडल

इस मॉडल में मुर्गियों की बीट मछलियों के चारे के रूप में इस्तेमाल होती है। इससे:

  • चारे का खर्च बचता है
  • उत्पादन बढ़ता है
  • मुनाफा ज्यादा होता है

ग्रामीण क्षेत्रों में यह मॉडल तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

आजीविका सेवा केंद्र से मिलेगा सपोर्ट

हर क्लस्टर में आजीविका सेवा केंद्र खोले जा रहे हैं, जहां महिलाओं को:

  • बीज और खाद
  • कृषि उपकरण
  • तकनीकी मार्गदर्शन

उपलब्ध कराया जाएगा। खास बात यह है कि इन केंद्रों का संचालन भी महिलाएं ही करेंगी।

पोषण के साथ स्वास्थ्य में सुधार

सब्जी बाड़ी और पोषण वाटिका से परिवारों को ताजी सब्जियां मिल रही हैं। इससे:

  • एनीमिया में कमी
  • बच्चों और महिलाओं को बेहतर पोषण
  • स्वास्थ्य में सुधार

देखने को मिल रहा है।

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