लोकसभा के हालिया सत्र में जो कुछ हुआ, उसने भारतीय राजनीति
की दिशा और दशा दोनों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। केंद्र सरकार का महत्वाकांक्षी संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 न सिर्फ पास नहीं हो पाया, अपितु संसद के भीतर ही
राजनीतिक टकराव का बड़ा प्रतीक बन गया। यह वही विधेयक था, जिसके जरिए लोकसभा
सीटों की संख्या बढ़ाने, महिला आरक्षण लागू करने और भविष्य के
परिसीमन की रूपरेखा तय करने की कोशिश की जा रही थी। लेकिन अंत में नतीजा यह रहा कि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील भी सदन का गणित नहीं बदल सकी।
घटनाक्रम की शुरुआत सरकार के उस तर्क से हुई, जिसमें कहा गया कि
देश की बढ़ती जनसंख्या और बदलते सामाजिक समीकरणों के अनुसार संसद में प्रतिनिधित्व
बढ़ाना समय की मांग है। मौजूदा 543 सीटों वाली लोकसभा
को बढ़ाकर लगभग 850 सीटों तक ले जाने का
प्रस्ताव रखा गया। इसके पीछे एक बड़ा उद्देश्य यह भी बताया गया कि महिला आरक्षण को
बिना मौजूदा सांसदों की सीटों को प्रभावित किए लागू किया जा सके। पहली नजर में यह
प्रस्ताव लोकतंत्र के विस्तार और समावेशिता की दिशा में एक बड़ा कदम नजर आया।
लेकिन जैसे ही बिल के प्रावधानों की परतें खुलनी शुरू हुईं, राजनीतिक विवाद भी
गहराने लगा। असली मुद्दा सीटें बढ़ाने से ज्यादा उस आधार को लेकर था, जिस पर यह नई सीटें
तय की जानी थीं। सरकार 2011 की जनगणना के आधार
पर परिसीमन की दिशा में आगे बढ़ना चाहती थी। यहीं से विपक्ष को बड़ा राजनीतिक
मुद्दा मिल गया। उनका तर्क था कि इससे उन राज्यों को अधिक लाभ मिलेगा, जहां जनसंख्या
वृद्धि अधिक रही है, जबकि दक्षिण भारत और कुछ छोटे राज्यों
की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम हो जाएगी।
लोकसभा में बहस के दौरान विपक्ष ने इस बिल को सीधे-सीधे महिला आरक्षण के
बहाने राजनीतिक पुनर्संरचना करार दिया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कई विपक्षी
नेताओं ने कहा कि सरकार महिला सशक्तिकरण के नाम पर क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ने
की कोशिश कर रही है। उनका यह भी कहना था कि यदि सरकार वास्तव में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देना
चाहती है, तो इसके लिए अलग से स्पष्ट और सरल विधेयक लाया जा
सकता था, न कि उसे परिसीमन जैसे जटिल और संवेदनशील मुद्दे से
जोड़ा जाए।
सरकार की ओर से लगातार यह संदेश देने की कोशिश हुई कि यह विधेयक ऐतिहासिक
है और इससे लोकतंत्र मजबूत होगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भावनात्मक अपील
करते हुए विपक्ष से आग्रह किया कि वे राजनीति से ऊपर उठकर इसका समर्थन करें। लेकिन
संसद का गणित भावनाओं से नहीं, बल्कि रणनीति और संख्या से चलता है।
मतदान के समय यही साफ दिखा, सरकार को साधारण बहुमत तो मिला, लेकिन संविधान
संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई समर्थन नहीं मिल पाया।
यहां सवाल सिर्फ संख्या का नहीं था, भरोसे का भी था।
विपक्ष पहले ही इस मुद्दे पर एकजुट हो चुका था। दिलचस्प बात यह रही कि कई ऐसे दल
भी पूरी तरह सहज नहीं दिखे, जो सामान्यतः सरकार के साथ खड़े रहते
हैं। इसका सीधा असर मतदान पर पड़ा और विधेयक गिर गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह सरकार की रणनीतिक चूक थी या एक
सोची-समझी राजनीतिक चाल। राजनीतिज्ञों की राय इस पर बंटी हुई है। एक वर्ग का मानना है कि
सरकार ने विपक्ष की एकजुटता को कम करके आंका और एक जटिल मुद्दे को पर्याप्त सहमति
के बिना सदन में ले आई। वहीं दूसरा वर्ग इसे एक राजनीतिक दांव के रूप में देखता
है। जहां सरकार यह संदेश देना चाहती थी कि वह महिला
आरक्षण के पक्ष में है, लेकिन विपक्ष ने उसे रोक दिया।
विधेयक गिरने के तुरंत बाद सरकार की प्रतिक्रिया भी काफी महत्वपूर्ण रही। संकेत मिले कि परिसीमन से जुड़े अन्य प्रस्तावों को फिलहाल टाल दिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने सार्वजनिक रूप से महिलाओं से निराशा व्यक्त की और यह भरोसा दिलाया कि सरकार इस दिशा में प्रयास जारी रखेगी।