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संसद में सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव पर सियासी तूफान, केंद्रीय मंत्री ने विपक्ष पर साधा निशाना, DMK पर तीखी टिप्पणी
लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव जहां सरकार के अनुसार लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करने की दिशा में कदम था, वहीं विपक्ष इसे क्षेत्रीय असंतुलन का खतरा मान रहा है। फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक टकराव का केंद्र बन चुका है और आने वाले दिनों में इस पर और तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
संसद में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने के
प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। प्रस्ताव खारिज होने के बाद केंद्र
सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं। केंद्रीय मंत्री जी.
किशन रेड्डी ने विपक्षी दलों, खासकर द्रविड़
मुनेत्र कड़गम (DMK), पर कड़ा हमला बोलते हुए उनके
रुख को “मूर्खतापूर्ण व्यवहार” करार दिया और कहा कि विपक्ष के पास कोई स्पष्ट नीति
नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से संसद में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के
उद्देश्य से सीटों के पुनर्विन्यास (delimitation से जुड़ा व्यापक विचार) का
प्रस्ताव रखा गया था। इसका मकसद तेजी से बढ़ती आबादी वाले राज्यों में सांसदों की
संख्या बढ़ाकर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करना था। केंद्रीय मंत्री के अनुसार, प्रस्ताव के तहत कुछ प्रमुख
राज्यों में सीटों की संख्या इस प्रकार बढ़ाने का विचार था जिसमें -
- आंध्र प्रदेश: 25 से बढ़ाकर
38
- कर्नाटक: 28 से बढ़ाकर
42
- तमिलनाडु: 39 से बढ़ाकर
59
सरकार का तर्क था कि यह कदम भविष्य में जनसंख्या आधारित
प्रतिनिधित्व को अधिक न्यायसंगत बनाएगा और संसद में क्षेत्रीय आवाज को मजबूती
देगा।
विपक्ष ने
क्यों किया विरोध : विपक्षी दलों, विशेष रूप से दक्षिण भारत के कई राजनीतिक
दलों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। उनका कहना है कि सीटों का पुनर्विन्यास केवल
जनसंख्या के आधार पर करना उन राज्यों के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने
जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। DMK और अन्य दलों की चिंता यह भी है कि अगर जनसंख्या के
आधार पर सीटें बढ़ाई जाती हैं, तो उत्तर भारत के राज्यों का
प्रभाव संसद में काफी बढ़ सकता है, जिससे दक्षिणी राज्यों की
राजनीतिक ताकत कम हो सकती है।
रेड्डी का
आरोप- देश के साथ अन्याय : जी. किशन रेड्डी ने कहा कि सरकार एक
“बेहतर और संतुलित फॉर्मूला” लेकर आई थी, जिसका उद्देश्य पूरे देश में समान
प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना था। उनके मुताबिक, विपक्ष ने
इसे बिना ठोस कारण के खारिज कर दिया, जो “देश के साथ अन्याय”
है। उन्होंने DMK पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी ने
बिना तथ्यात्मक आधार के इस प्रस्ताव का विरोध किया और क्षेत्रीय राजनीति को बढ़ावा
देने की कोशिश की।
सियासी असर और
आगे का रास्ता : यह मुद्दा अब सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय
राजनीति का बड़ा विषय बन गया है। आने वाले समय में यह बहस और तेज हो सकती है,
खासकर तब जब देश में अगली परिसीमन प्रक्रिया (Delimitation) की चर्चा आगे बढ़ेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि सीटों के पुनर्विन्यास का मुद्दा
बेहद संवेदनशील है,
क्योंकि इसमें जनसंख्या, क्षेत्रीय संतुलन और
राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे कई जटिल पहलू जुड़े हैं। ऐसे में सरकार और विपक्ष के
बीच सहमति बनाना आसान नहीं होगा।