अक्षय तृतीया जैसे पावन पर्व पर मिट्टी की मूर्तियों और बर्तनों की मांग कई गुना बढ़ जाती है। इस महापर्व को लेकर कुम्हार समुदाय की तैयारियां भी 15 /20 पहले से ही शुरू हो जाती हैं। परंपरागत रूप से कुम्हार समुदाय के लोग इस अवसर के लिए लगभग 15 से 20 दिन पहले ही अपने काम में जुट जाते हैं, ताकि समय पर सभी उत्पाद तैयार किए जा सकें। इस वर्ष 20 अप्रैल को अक्षय तृतीया होने के कारण मार्च के अंतिम सप्ताह और अप्रैल की शुरुआत से ही गांवों और कस्बों में चाक की गति तेज हो गई है । कुम्हारों के घरों और कार्यस्थलों पर दिन-रात मेहनत का दौर देखने को मिलता है।

मिट्टी से मूर्ति बनने तक का सफर
मूर्तियों और बर्तनों के निर्माण की प्रक्रिया सरल नहीं होती, बल्कि इसमें धैर्य और कौशल दोनों की आवश्यकता होती है। सबसे पहले शुद्ध काली मिट्टी का चयन किया जाता है। इसके बाद उसे अच्छी तरह गूंथकर चाक पर चढ़ाया जाता है और गुड्डे गुड़ियों को आकार दिए जाते हैं। इसके बाद तैयार वस्तुओं को प्राकृतिक धूप में कई दिनों तक सुखाया जाता है। सूखने के बाद इन्हें आग की भट्ठी में पकाया जाता है, जिसमें लगभग 4 से 5 दिन का समय लगता है। अंतिम चरण में रंग-रोगन किया जाता है, जो पर्व से लगभग एक सप्ताह पहले शुरू होता है। रंगों से सजी ये मूर्तियां और बर्तन त्योहार की रौनक बढ़ा देते हैं।
अक्षय तृतीया पर खास मांग
इस पर्व पर कुछ विशेष मिट्टी उत्पादों की मांग सबसे अधिक रहती है। इनमें मिट्टी के गुड्डा-गुड़िया, कलश और देवी-देवताओं की मूर्तियां प्रमुख से बनाई जाती हैं।
बुंदेलखंड और मध्य भारत के कई हिस्सों में इस दिन मिट्टी के गुड्डा-गुड़ियों का विवाह कराने की परंपरा आज भी जीवित है। कुम्हार इन्हें दूल्हा-दुल्हन की तरह सजाकर विशेष रूप से तैयार करते हैं।
इसके अलावा, दान और पूजा-पाठ की परंपरा के कारण मिट्टी के घड़ों और कलशों की भी भारी मांग रहती है। लोग इन्हें शुभ मानकर घर ले जाते हैं और धार्मिक कार्यों में उपयोग करते हैं। साथ ही, माँ महालक्ष्मी और गणेश जी की मिट्टी की मूर्तियों को भी समृद्धि और सौभाग्य के प्रतीक के रूप से खरीदा जाता है।
बदलते समय में भी कायम परंपरा
स्थानीय कुम्हारों के अनुसार, भले ही आज के समय में लोग सोने-चांदी और आधुनिक वस्तुओं की ओर अधिक आकर्षित होते जा रहे है, लेकिन शगुन और परंपरा के तौर पर मिट्टी के बर्तन और मूर्तियों का महत्व आज भी बना हुआ है। कुम्हारपारा के राजेश प्रजापति, कांशी प्रजापति का कहना है कि यह काम केवल रोजगार नहीं बल्कि उनकी सांस्कृतिक विरासत भी है, जिसे वे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं। अक्षय तृतीया का यह पर्व धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि कुम्हारों की मेहनत और पारंपरिक कला को भी जीवित रखने का माध्यम बनता है।
