अफ्रीकी देश एक बार फिर घातक इबोला वायरस की चपेट में आ गया है। देश में तेजी से फैल रहे संक्रमण ने न सिर्फ अफ्रीका बल्कि पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। अब तक 80 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 300 से अधिक संदिग्ध संक्रमण मामले सामने आए हैं। लगातार बढ़ते मामलों और पड़ोसी देशों तक संक्रमण फैलने की आशंका को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है। स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, इस बार संक्रमण के पीछे इबोला वायरस का “बुंडीबुग्यो स्ट्रेन” जिम्मेदार है, जिसे वायरस का बेहद दुर्लभ और खतरनाक रूप माना जाता है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि फिलहाल इस स्ट्रेन के खिलाफ कोई प्रभावी वैक्सीन या विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस वायरस की मृत्यु दर 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, यानी संक्रमित हर दो लोगों में से एक की जान जाने का खतरा बना हुआ है। कांगो के इटुरी प्रांत में सबसे पहले संक्रमण के मामले सामने आए थे, लेकिन अब यह कई इलाकों में तेजी से फैल रहा है। स्वास्थ्य एजेंसियां संक्रमित लोगों की पहचान, आइसोलेशन और निगरानी बढ़ाने में जुटी हुई हैं। वहीं, युगांडा, केन्या और दक्षिण सूडान जैसे पड़ोसी देशों ने भी अपनी सीमाओं पर स्वास्थ्य जांच और निगरानी कड़ी कर दी है, ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जा सके।
वायरस बढ़ाई पूरी दुनिया की चिंता
अफ्रीका एक बार फिर घातक इबोला वायरस की चपेट में आ गया है। देश के पूर्वोत्तर इटुरी प्रांत में तेजी से फैल रहे संक्रमण ने अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। अब तक 80 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 300 से अधिक संदिग्ध संक्रमण मामले सामने आए हैं। लगातार बढ़ते संक्रमण और पड़ोसी देशों तक इसके पहुंचने की आशंका को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे “वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल” घोषित कर दिया है। यह घोषणा किसी भी बीमारी के लिए डब्ल्यूएचओ द्वारा जारी की जाने वाली सबसे गंभीर चेतावनियों में से एक मानी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते संक्रमण को नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह मध्य और पूर्वी अफ्रीका के कई देशों के लिए बड़े स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकता है।
इबोला क्या हैऔर क्यों इतना खतरनाक है
इबोला वायरस दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक माना जाता है। यह संक्रमित व्यक्ति के खून, पसीने, उल्टी, शरीर के तरल पदार्थ और संक्रमित वस्तुओं के संपर्क से फैलता है। इस वायरस से संक्रमित व्यक्ति में तेज बुखार, कमजोरी, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, उल्टी, दस्त और बाद में गंभीर रक्तस्राव जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर इलाज न मिलने पर यह वायरस बहुत तेजी से जानलेवा साबित हो सकता है। कई मामलों में संक्रमित मरीजों की मौत कुछ ही दिनों में हो जाती है। यही वजह है कि इबोला का नाम सुनते ही दुनिया भर की स्वास्थ्य एजेंसियां सतर्क हो जाती हैं।
बुंडीबुग्यो स्ट्रेन बना सबसे बड़ी चुनौती
इस बार संक्रमण इबोला वायरस के “बुंडीबुग्यो स्ट्रेन” से जुड़ा हुआ है। यह वायरस का बेहद दुर्लभ और खतरनाक रूप है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि फिलहाल इस स्ट्रेन के खिलाफ कोई स्वीकृत वैक्सीन या प्रभावी इलाज मौजूद नहीं है। कांगो के स्वास्थ्य मंत्री सैमुअल-रोजर कांबा के अनुसार, इस स्ट्रेन की मृत्यु दर 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यानी संक्रमित होने वाले हर दो लोगों में से एक की जान जा सकती है। यही कारण है कि इस प्रकोप को बेहद गंभीर माना जा रहा है।
एक नर्स से शुरू हुआ संक्रमण
कांगो सरकार के मुताबिक, संक्रमण का पहला मामला 24 अप्रैल को इटुरी प्रांत के बुनीया शहर में सामने आया था। यहां एक नर्स संक्रमित पाई गई थी। शुरुआत में इसे सामान्य बीमारी माना गया, लेकिन बाद में जांच में इबोला संक्रमण की पुष्टि हुई। इसके बाद संक्रमण तेजी से आसपास के इलाकों में फैलने लगा। अब बुनीया, रवामपारा और मोंगवालू जैसे इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित बताए जा रहे हैं। कई लोगों को आइसोलेशन सेंटर में रखा गया है, जबकि सैकड़ों संदिग्ध मरीजों की निगरानी की जा रही है। स्वास्थ्य एजेंसियां गांव-गांव जाकर संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों की पहचान करने में जुटी हुई हैं।
सीमाओं पर अलर्ट
स्थिति तब और ज्यादा गंभीर हो गई जब कांगो से संक्रमित एक नागरिक की मौत पड़ोसी देश युगांडा में हो गई। इसके बाद युगांडा,केन्या और साऊथ सूडान ने अपनी सीमाओं पर निगरानी बढ़ा दी है। एयरपोर्ट, बस स्टैंड और सीमावर्ती इलाकों में यात्रियों की स्वास्थ्य जांच की जा रही है।अफ्रीका CDC ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि क्षेत्रीय स्तर पर तुरंत समन्वय नहीं बढ़ाया गया, तो संक्रमण कई देशों में फैल सकता है। इसके लिए मेडिकल टीमें, मोबाइल लैब और इमरजेंसी हेल्थ यूनिट्स तैनात की जा रही हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने घोषित किया वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इस प्रकोप में कई ऐसे कारक हैं जो इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर खतरा बनाते हैं। इनमें सीमावर्ती देशों में संक्रमण का फैलाव, वैक्सीन की अनुपलब्धता, कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और तेजी से बढ़ते संदिग्ध मामलों की संख्या शामिल है। हालांकि WHO ने अभी इसे “महामारी” घोषित नहीं किया है, लेकिन संगठन ने साफ कहा है कि यह क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर स्वास्थ्य खतरा बन सकता है। WHO ने लोगों को अनावश्यक यात्रा से बचने और संक्रमित व्यक्तियों को तत्काल आइसोलेशन में रखने की सलाह दी है।
पहले भी तबाही मचा चुका है इबोला
इबोला वायरस पहली बार 1976 में अफ्रीका में सामने आया था। उस समय सूडान और तत्कालीन जायरे (अब कांगो) में इसके मामले मिले थे। इसके बाद अफ्रीका में समय-समय पर कई बड़े प्रकोप सामने आते रहे हैं।सबसे भयावह प्रकोप 2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में देखा गया था, जब लाइबेरिया, गिनी और सिएरा लियोन जैसे देशों में 11 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। उस समय अस्पतालों में जगह कम पड़ गई थी और कई देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं पूरी तरह चरमरा गई थीं। मौजूदा प्रकोप यदि नियंत्रण से बाहर हुआ, तो यह पहले जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।
क्या भारत के लिए भी खतरा बढ़ सकता है
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत के लिए फिलहाल सीधा खतरा कम माना जा रहा है, क्योंकि प्रभावित क्षेत्रों से भारत की सीधी यात्रा सीमित है। इसके बावजूद स्वास्थ्य एजेंसियों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।अंतरराष्ट्रीय यात्राओं और वैश्विक संपर्कों को देखते हुए एयरपोर्ट स्क्रीनिंग, ट्रैवल हिस्ट्री की जांच और अस्पतालों की तैयारी बढ़ाने की जरूरत बताई जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी संदिग्ध लक्षण वाले व्यक्ति की तुरंत जांच और आइसोलेशन बेहद जरूरी होगा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार सबसे बड़ा खतरा संक्रमण का सीमावर्ती इलाकों में फैलना है। पूर्वी कांगो पहले से ही हिंसा, गरीबी और कमजोर स्वास्थ्य सुविधाओं से जूझ रहा है। कई इलाकों में मेडिकल टीमों का पहुंचना मुश्किल है, जिससे वायरस को रोकना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। यदि समय रहते संक्रमण को नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह अफ्रीका के कई देशों के लिए मानवीय और स्वास्थ्य आपदा का रूप ले सकता है।

