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गांव पहुंची सचिन की बेटियों ने  बैगा परिवार की नवजात शिशु को दुलारा
गांव पहुंची सचिन की बेटियों ने बैगा परिवार की नवजात शिशु को दुलारा
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छत्तीसगढ़ में तेंदुलकर परिवार : अचानकमार टाइगर रिजर्व में अचानक पहुंचीं सचिन की पत्नी और बेटियों ने जंगलों की नमी में घुली संवेदनाओं को किया महसूस

सचिन के परिवार का छत्तीसगढ़ दौरा एक औपचारिक कार्यक्रम से कहीं आगे जाकर मानवीय संवेदनाओं का जीवंत उदाहरण बन गया। दो दिनों तक चला यह प्रवास पूरी तरह गोपनीय रखा गया, लेकिन इसकी सादगी और आत्मीयता ने इसे विशेष बना दिया। अंजलि तेंदुलकर, सारा तेंदुलकर और सानिया चंडोक तेंदुलकर ने मुंगेली जिले के अचानकमार टाइगर रिजर्व के सुदूर वनांचल क्षेत्रों का दौरा किया और वहां के जनजीवन को करीब से समझा।

डॉ. नीरज गजेंद्र
प्रकाशित: 09 Apr 2026, 11:10 AM · अपडेट: 18 Sep 2026, 03:31 AM
छत्तीसगढ़
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

कभी-कभी कोई यात्रा खबर नहीं बनती, एहसास बन जाती है। छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचलों में बीते ये दो दिन कुछ ऐसे ही थे, जहां शोर नहीं था, बस संवेदना की धीमी-सी आहट थी। भारत रत्न सचिन तेंदुलकर का नाम भले इस यात्रा के साथ जुड़ा हो, लेकिन इस बार मैदान नहीं, इंसानियत केंद्र में थी। सचिन के परिवार का छत्तीसगढ़ दौरा एक औपचारिक कार्यक्रम से कहीं आगे जाकर मानवीय संवेदनाओं का जीवंत उदाहरण बन गया। दो दिनों तक चला यह प्रवास पूरी तरह गोपनीय रखा गया, लेकिन इसकी सादगी और आत्मीयता ने इसे विशेष बना दिया। अंजलि तेंदुलकर, सारा तेंदुलकर और सानिया चंडोक तेंदुलकर ने मुंगेली जिले के अचानकमार टाइगर रिजर्व के सुदूर वनांचल क्षेत्रों का दौरा किया और वहां के जनजीवन को करीब से समझा। तेंदुलकर परिवार जब अचानकमार टाइगर रिजर्व के भीतर बसे बैगा गांवों की ओर बढ़ीं, तो यह सिर्फ एक दौरा नहीं था, यह दिलों तक पहुंचने की एक शांत कोशिश थी।

पगडंडियों पर उतरी अपनत्व की भाषा

लोरमी क्षेत्र के बम्हनी, लमनी और छपरवा जैसे आदिवासी गांवों में पहुंचकर तेंदुलकर परिवार ने बैगा समुदाय के बीच समय बिताया। गांव की पगडंडियों पर पैदल चलते हुए उन्होंने ग्रामीणों से सीधी बातचीत की और उनके जीवन की कठिनाइयों को महसूस किया। इस दौरान कई भावुक दृश्य सामने आए। परिवार की महिलाओं ने नवजात शिशुओं को गोद में लेकर स्नेह जताया, बच्चों के साथ सहज संवाद किया और बिना किसी औपचारिकता के उनके बीच घुल-मिल गईं। यह जुड़ाव ग्रामीणों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था। बम्हनी, लमनी और छपरवा की मिट्टी ने शायद पहली बार इतनी सहज मेहमाननवाज़ी देखी। कोई औपचारिकता नहीं, कोई मंच नहीं, बस पगडंडियों पर चलते कदम और आंखों में सच्ची जिज्ञासा। ग्रामीणों से बातचीत में सवाल कम थे, समझने की चाह ज्यादा थी। जब नवजात शिशु को गोद में लेकर स्नेह जताया गया, तो वह दृश्य किसी तस्वीर से ज्यादा एक एहसास था। बच्चों की खिलखिलाहट और उनके बीच घुलती यह सादगी बता रही थी कि रिश्ते बनाने के लिए शब्द नहीं, संवेदना चाहिए। क्योंकि जहां शब्द कम पड़ जाते हैं, वहीं से रिश्तों की शुरुआत होती है।

सचिन का परिवार गांव की जिंदगी से रुबरू होते हुए

सेवा का शांत विस्तार

गनियारी स्थित जन स्वास्थ्य सहयोग में पहुंचकर यह यात्रा और गहराई लेती है। यहां फुलवारी के रूप में शिशु देखभाल की वह दुनिया दिखाई देती है, जहां छोटे-छोटे जीवनों को सहेजने की बड़ी कोशिशें चल रही हैं। अस्पताल के गलियारों में कोई औपचारिक निरीक्षण नहीं था, बल्कि हर व्यवस्था को समझने की एक विनम्र जिज्ञासा थी। डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के साथ बातचीत में योजनाएं नहीं, बल्कि भरोसे की नींव रखी जा रही थी।

सादगी में छिपा संदेश

यह यात्रा खत्म जरूर हुई, लेकिन अपने पीछे एक सवाल छोड़ गई कि क्या हम भी कभी बिना शोर किए किसी के जीवन में उजाला बन सकते हैं? तेंदुलकर परिवार की यह पहल सिर्फ एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक मौन विरासत है, जो बताती है कि असली महानता ऊंचाइयों में नहीं, झुककर साथ खड़े होने में है। यह पूरा दौरा बिना किसी प्रचार के हुआ, मानो यह बताने के लिए कि असली काम को शोर की जरूरत नहीं होती। जब समाज के सबसे दूर हिस्सों तक कोई हाथ बढ़ता है, तो वह सिर्फ मदद नहीं, उम्मीद भी देता है। रोशनी देने वाले चिराग पूछते नहीं, किसके घर में अंधेरा ज्यादा है।

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