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सुप्रीम कोर्ट : धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर सार्वजनिक सड़कों को अब नहीं कर सकेंगे अवरूद्ध

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर सार्वजनिक सड़कों को अवरुद्ध नहीं किया जा सकता। पूजा-पाठ की स्वायत्तता कायम है, पर धर्मनिरपेक्ष गतिविधियां प्रभावित होने पर राज्य हस्तक्षेप करेगा। सबरीमाला समेत मामलों की सुनवाई में संविधान पीठ ने अधिकारों के संतुलन पर जोर दिया।

कीर्तिमान ब्यूरो
प्रकाशित: 29 Apr 2026, 09:22 AM · अपडेट: 29 Apr 2026, 07:38 PM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को टिप्पणी करते हुए कहा कि धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध नहीं किया जा सकता है और किसी भी धार्मिक समुदाय को पूजा-पाठ करने के तरीके में स्वायत्तता है और अदालत उसके धार्मिक मामलों में फैसला नहीं सुना सकती है, लेकिन अगर किसी धर्मनिरपेक्ष गतिविधि पर असर पड़ रहा है, तो सरकार उसके अधिकारों में हस्तक्षेप कर सकती है।

केरल के सबरीमाला मंदिर सहित अन्य मामलों में हुई सुनवाई

केरल के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी की। पीठ में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल थे। सुनवाई के नौवें दिन, अदालत में हिंदू धर्म आचार्य सभा का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता अक्षय नागराजन ने दलील दी कि सरकार अनुच्छेद 25(2)(क) के आधार पर किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

क्या है अनुच्छेद 25 (2)

संविधान के अनुच्छेद 25(2)(क) के तहत राज्य को धार्मिक प्रथाओं से जुड़ी किसी भी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधि को विनियमित या प्रतिबंधित करने का अधिकार प्राप्त है। नागराजन ने कहा कि अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाला संरक्षण केवल धार्मिक आस्था के मामलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आस्था की बाहरी अभिव्यक्तियाँ भी शामिल हैं, जिनमें किसी विशेष देवता की पूजा से जुड़े अनुष्ठान, रीति-रिवाज, समारोह और प्रथाएं शामिल हैं।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने की टिप्पणी

इन दलीलों के आधार पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने टिप्पणी की कि यदि किसी धर्मनिरपेक्ष गतिविधि पर धार्मिक गतिविधियों का प्रभाव पड़ता है तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है। उन्होंने कहा, “मान लीजिए कोई मंदिर है, वे वार्षिक उत्सव मनाना चाहते हैं, जैसे कि वार्षिक रथ यात्रा। आप मंदिर के आसपास की सभी सड़कों को अवरुद्ध नहीं कर सकते। इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।
आप अपनी धार्मिक गतिविधि कर सकते हैं, लेकिन सड़कों को अवरुद्ध करके नहीं। राज्य नियमन के लिए हस्तक्षेप कर सकता है।” न्यायमूर्ति नागरत्ना ने जोर देकर कहा कि यद्यपि न्यायालय किसी धार्मिक समुदाय के धार्मिक मामलों पर निर्णय नहीं दे सकता क्योंकि संविधान के तहत उस समुदाय को स्वायत्तता दी गई है, लेकिन जब धर्मनिरपेक्ष गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है।

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