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नर्मदा नदी की दंडवत परिक्रमा
नर्मदा नदी की दंडवत परिक्रमा
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आस्था की पराकाष्ठा : तपती सड़क पर दंडवत प्रणाम करते पुत्र और नंगे पैर अखंड ज्योत थामे मां की अनूठी नर्मदा परिक्रमा

बालकदास बाल ब्रह्मचारी अपनी मां चंद्रकली के साथ भीषण गर्मी में नर्मदा नदी की कठिन दंडवत परिक्रमा कर रहे हैं। वे रोज़ 5–7 किमी जमीन पर लेटकर बिना किसी सहारे के यात्रा करते हैं और केवल एक बार फलाहार लेते हैं। उनकी मां नंगे पैर साथ चलती हैं और अखंड ज्योत संभालती हैं। यह उनकी दूसरी परिक्रमा है और वे समाज को नशामुक्ति, स्वच्छता और नैतिक मूल्यों का संदेश भी दे रहे हैं।

कीर्तिमान डेस्क
कीर्तिमान डेस्क
04 May 2026, 03:20 PM
बड़वानी

जब श्रद्धा अटूट हो, तो मौसम की मार और शरीर की थकावट गौण हो जाती है। निमाड़ अंचल में इन दिनों सूरज की तपिश अपने चरम पर है और पारा 43 डिग्री सेल्सियस को छू रहा है। इस भीषण गर्मी में जहां आम जनमानस घरों से बाहर निकलने में हिचक रहा है, वहीं ग्वालियर निवासी एक मां-बेटे की जोड़ी अपनी कठिन तपस्या से समूचे क्षेत्र में चर्चा और श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है।

कठिन संकल्प: सीधे जमीन पर दंडवत यात्रा

ग्वालियर के बालकदास बाल ब्रह्मचारी ने मां नर्मदा की परिक्रमा का एक ऐसा संकल्प लिया है, जिसे देख राहगीर दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। वे प्रतिदिन 5 से 7 किलोमीटर की दूरी दंडवत (जमीन पर लेटकर) पूरी करते हैं। हैरानी की बात यह है कि सड़क की तपती डामर और पत्थरों के बीच वे किसी चटाई या गद्दे का उपयोग नहीं करते, बल्कि सीधे भूमि पर लेटकर अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते हैं।

बालकदास की जीवनशैली भी किसी कठोर तपस्वी से कम नहीं है। वे मात्र 7 वर्ष की आयु से ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं और पिछले 20 वर्षों से उन्होंने अन्न का पूरी तरह त्याग कर दिया है। वे दिन में केवल एक बार फलाहार ग्रहण करते हैं।

मां की ममता और भक्ति का संगम

इस कठिन यात्रा में उनकी माता, चंद्रकली जी, साये की तरह उनके साथ हैं। वे न केवल नंगे पैर इस तपती धरती पर चल रही हैं, बल्कि उनके हाथों में एक अखंड ज्योत भी प्रज्वलित है, जिसकी लौ को वे हर बाधा से बचाकर आगे बढ़ रही हैं। मां चंद्रकली भी पुत्र की भांति केवल एक समय फलाहार कर इस आध्यात्मिक अनुष्ठान को पूर्ण कर रही हैं।

यह बालकदास की दूसरी परिक्रमा है। इससे पहले वे 9 वर्षों की लंबी 'मौन परिक्रमा' सफलतापूर्वक पूर्ण कर चुके हैं। वर्तमान में वे ऋषि मार्कंडेय परंपरा का अनुसरण कर रहे हैं, जिसे उन्होंने 7 वर्षों में पूर्ण करने का संकल्प लिया है। इस यात्रा में उनके साथ लक्ष्मण दास और किरणदेवी भी सहयोगी के रूप में चल रहे हैं।

समाज को दे रहे हैं नैतिकता का संदेश

अपनी यात्रा के दौरान विश्राम के क्षणों में यह मां-बेटा केवल धर्म की चर्चा ही नहीं करते, बल्कि सामाजिक कुरीतियों पर भी प्रहार करते हैं। वे ग्रामीणों को नर्मदा स्वच्छता, गौ-सेवा और बेटी बचाओ का संदेश दे रहे हैं। बालकदास लोगों से नशा मुक्ति, मांस-मदिरा के त्याग और घर-घर रामायण पाठ करने का आग्रह करते हैं। साथ ही, वे नर्मदा तटों से अवैध रेत खनन रोकने और 'धर्म के नाम पर हो रहे व्यापार' से सावधान रहने की अपील भी कर रहे हैं।

हाल ही में जब यह परिक्रमा दल अंजड पहुंचा, तो ठीकरी रोड पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पुष्पहारों से उनका भव्य स्वागत किया। लोगों ने इस अद्भुत मातृ-पितृ भक्ति और कठिन तपस्या के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

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