बस्तर अंचल के ऐतिहासिक नगर बारसूर में स्थित बत्तीसा मंदिर आज भी अपनी अद्भुत शिल्पकला, रहस्यमयी संरचना और प्राचीन स्थापत्य कौशल के कारण लोगों को आकर्षित कर रहा है। करीब 800 वर्ष पुराने इस मंदिर को भारतीय वास्तुकला का अनमोल धरोहर माना जाता है। दंतेवाड़ा जिले के बारसूर में स्थित यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन वैज्ञानिक सोच का जीवंत प्रमाण भी है।
कभी नागवंशी शासकों की राजधानी रहा बारसूर आज “मंदिरों की नगरी” के नाम से प्रसिद्ध है। यहां मौजूद बत्तीसा मंदिर अपनी अनूठी बनावट और ऐतिहासिक महत्व के कारण विशेष पहचान रखता है।
32 पत्थर के स्तंभों पर खड़ा है पूरा मंदिर
इतिहासकारों के अनुसार बत्तीसा मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में नागवंशी शासक सोमेश्वर देव के शासनकाल में हुआ था। शिलालेखों में इसका निर्माण शक संवत 1130 यानी लगभग 1209 ईस्वी में पूर्ण होना बताया गया है।
मंदिर का नाम “बत्तीसा” इसलिए पड़ा क्योंकि इसकी पूरी संरचना 32 विशाल पत्थर के स्तंभों पर टिकी हुई है। ये स्तंभ आठ पंक्तियों में बेहद संतुलित ढंग से स्थापित किए गए हैं। स्थापत्य विशेषज्ञ इसे उस दौर की उन्नत इंजीनियरिंग और वास्तु ज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण मानते हैं।
बिना चूना-गारा के जोड़े गए पत्थर
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके निर्माण में किसी भी प्रकार के चूना या गारे का उपयोग नहीं किया गया। विशाल पत्थरों को इस तरह जोड़ा गया है कि सदियों बाद भी इसकी संरचना मजबूती से खड़ी है।
मंदिर के प्रत्येक स्तंभ पर देवी-देवताओं, पौराणिक प्रसंगों और अलंकरणों की बेहद बारीक नक्काशी देखने को मिलती है। यह शिल्प उस समय के कारीगरों की अद्भुत कला और सौंदर्यबोध को दर्शाता है।
दो गर्भगृह, अलग-अलग पूजा करते थे राजा-रानी
मंदिर की संरचना चतुर्भुजाकार है और इसमें दो अलग-अलग गर्भगृह बनाए गए हैं। दोनों में शिवलिंग स्थापित हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में राजा और रानी अलग-अलग गर्भगृह में पूजा-अर्चना करते थे।
गर्भगृह के बाहर स्थापित विशाल नंदी प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यहां यह मान्यता भी प्रचलित है कि नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहने से इच्छाएं पूरी होती हैं।
बिना आवाज घूम सकता है शिवलिंग
बत्तीसा मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपनी विशेष संरचना के कारण काफी चर्चित है। स्थानीय लोगों और इतिहासकारों के अनुसार यह शिवलिंग एक विशेष यांत्रिक प्रणाली पर आधारित है, जो जल प्रवाह के प्रभाव से बिना घर्षण और बिना ध्वनि के घूम सकता है। इसे प्राचीन भारतीय विज्ञान और तकनीकी समझ का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।
दान में दिया गया था गांव
शिलालेखों के अनुसार मंदिर के रखरखाव के लिए केरामरूका नामक गांव दान में दिया गया था। मंदिर निर्माण के दौरान तत्कालीन मंत्री, सचिव और अन्य गणमान्य लोगों की उपस्थिति का भी उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि इससे जुड़ा शिलालेख वर्तमान में नागपुर संग्रहालय में सुरक्षित है।
बाणासुर से भी जुड़ी हैं मान्यताएं
बारसूर को लेकर कई पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं। मान्यता है कि असुर राजा बाणासुर ने इस क्षेत्र में अपनी राजधानी बसाई थी, जो आगे चलकर ऐतिहासिक बारसूर के रूप में विकसित हुआ। दंडकारण्य क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक धारा में इस स्थल का विशेष महत्व माना जाता है।
विशाल गणेश प्रतिमा भी खींचती है पर्यटकों को
बारसूर में बत्तीसा मंदिर के अलावा मामा-भांजा मंदिर और चंद्रादित्य मंदिर भी प्रसिद्ध हैं। यहां स्थापित विश्व की तीसरी सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयास
राज्य सरकार और पुरातत्व विभाग द्वारा इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2003 में मंदिर के संरक्षण और पुनर्निर्माण का कार्य भी कराया गया था, जिससे इसकी मूल संरचना और ऐतिहासिक सौंदर्य को सुरक्षित रखा जा सके।
आज बत्तीसा मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल हो चुका है। यह मंदिर न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि प्रदेश की प्राचीन कला, संस्कृति और इतिहास की गौरवगाथा भी बयां करता है। सदियों पुराने पत्थरों में उकेरी गई यह धरोहर हर आगंतुक को भारत की समृद्ध सभ्यता से रूबरू कराती है।
