छत्तीसगढ़ के जंगलों में भीषण गर्मी और पानी की किल्लत अब वन्यप्राणियों के लिए काल बनने लगी है। रायगढ़ वन परिक्षेत्र से एक हृदय विदारक घटना सामने आई है, जहां प्यास बुझाने की आस में जंगल से भटककर रिहायशी इलाके में पहुंचे एक कोटरी (हिरण की एक दुर्लभ प्रजाति) की कुत्तों के हमले और अत्यधिक तनाव के कारण मौत हो गई।
प्यास ने दिखाया मौत का रास्ता
भीषण तपिश के कारण जंगलों के प्राकृतिक जलस्रोत सूखने लगे हैं। इसी क्रम में बुधवार को चिराईपानी के जंगलों से निकलकर एक प्यासा कोटरी भटकते हुए आबादी वाले क्षेत्र में पहुंच गया। जैसे ही वह बस्ती के करीब आया, आवारा कुत्तों के एक झुंड ने उसे अपना निशाना बना लिया। कुत्तों के हिंसक हमले से बचने के लिए बेबस कोटरी ने भागकर पास के ही एक ग्रामीण, मनोज डनसेना के घर के आंगन में शरण ली।
ग्रामीणों की सतर्कता और रेस्क्यू
कोटरी को कुत्तों से घिरा देख स्थानीय ग्रामीणों ने तत्काल साहस दिखाया। लाठी-डंडों की मदद से कुत्तों को खदेड़ा गया, जिससे कोटरी की जान तो बच गई, लेकिन वह बुरी तरह लहूलुहान हो चुका था। उसके पिछले पैरों में गहरे जख्म थे और वह दहशत के कारण बुरी तरह कांप रहा था। ग्रामीणों की सूचना पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और घायल वन्यप्राणी को अपने संरक्षण में लिया।
उपचार और जंगल में वापसी
वनकर्मियों ने कोटरी को पशु चिकित्सक के पास पहुंचाया, जहां उसका प्राथमिक उपचार किया गया। वन विभाग को लगा कि कोटरी अब खतरे से बाहर है, इसलिए उसे उसके प्राकृतिक आवास देलारी जंगल में सुरक्षित छोड़ दिया गया। विभाग की एक टीम दूर से उसकी निगरानी भी कर रही थी।

संवेदनशीलता ने तोड़ा दम
शाम के वक्त जब वन विभाग की टीम ने कोटरी का निरीक्षण किया, तो वह जंगल में एक ही स्थान पर निश्चल बैठा मिला। पास जाकर देखने पर पता चला कि उसकी मृत्यु हो चुकी है।
रायगढ़ रेंजर संजय लकड़ा ने इस घटना पर दुख व्यक्त करते हुए कहा: "कोटरी जैसे वन्यप्राणी स्वभाव से अत्यंत संवेदनशील और डरपोक होते हैं। कुत्तों के हमले के घाव के साथ-साथ 'कैप्चर मायोपैथी' (अत्यधिक डर और तनाव के कारण होने वाली शारीरिक स्थिति) अक्सर उनकी मौत का कारण बन जाती है।"
पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार
मृत कोटरी को देर शाम इंदिरा विहार लाया गया। गुरुवार की सुबह विशेषज्ञों की मौजूदगी में उसका पोस्टमार्टम किया गया और विभागीय नियमों के तहत सम्मानजनक तरीके से दाह संस्कार कर दिया गया। यह घटना स्पष्ट करती है कि वन्यप्राणियों को सुरक्षित रखने के लिए जंगलों के भीतर पानी की पर्याप्त व्यवस्था करना अब समय की मांग बन चुका है।
