छत्तीसगढ़ की तपती दोपहरी में जब आसमान से आग बरस रही होती है और कोलतार की सड़कें भट्टी की तरह तप रही होती हैं, तब बस्तर के जामगुड़ा गांव से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने के साथ-साथ प्रशासनिक दावों पर कालिख पोतती नजर आती है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने 'जल जीवन मिशन' और 'दिव्यांग कल्याण' जैसे भारी-भरकम शब्दों की जमीनी हकीकत उजागर कर दी है।
हर बूंद के लिए जान जोखिम में
इस वीडियो में एक दिव्यांग महिला, दुलमा कश्यप, भीषण गर्मी के बीच घुटनों के बल रेंगते हुए सड़क पार कर रही हैं। उनके सिर पर पानी से भरा एक बर्तन है, जिसे वे बड़ी मुश्किल से संतुलित किए हुए हैं। एक तरफ से तेज रफ्तार वाहन गुजर रहे हैं और दूसरी तरफ दुलमा अपनी प्यास बुझाने के लिए मौत से जूझ रही हैं। यह मंजर किसी फिल्म का नहीं, बल्कि बस्तर ब्लॉक के जामगुड़ा गांव की रोजमर्रा की हकीकत है।
दुलमा के लिए पानी लाना किसी जंग को जीतने जैसा है। उन्हें हर दिन करीब 200 मीटर का सफर घुटनों के बल तय करना पड़ता है। सड़क के उस पार स्थित एक हैंडपंप या निजी बोरवेल ही उनके लिए जीवन का एकमात्र सहारा है। शारीरिक अक्षमता और सड़क का ट्रैफिक मिलकर उनकी इस चुनौती को जानलेवा बना देते हैं।
कागजों पर बहती 'विकास' की गंगा, जमीन पर सूखी टंकी
सरकार का दावा है कि घर-घर नल से जल पहुंच रहा है, लेकिन जामगुड़ा की स्थिति इसके उलट है। गांव में वर्षों पहले एक ऊंची ओवरहेड पेयजल टंकी बनाई गई थी, जो आज सफेद हाथी साबित हो रही है। बिना पाइपलाइन और बिना नल कनेक्शन के यह टंकी केवल सरकारी फाइलों में विकास का प्रतीक बनी खड़ी है।
गांव में जल जीवन मिशन के तहत लगाए गए कनेक्शन धूल फांक रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि:
गांव के 7 हैंडपंपों में से अधिकांश खराब पड़े हैं।
जिन हैंडपंपों से पानी निकलता है, वहां इतनी भीड़ होती है कि घंटों इंतजार करना पड़ता है।
मजबूरी में ग्रामीणों को निजी स्रोतों या असुरक्षित पानी पर निर्भर रहना पड़ता है।
टूटी ट्राईसाइकिल और प्रशासनिक उदासीनता
दुलमा कश्यप का संघर्ष केवल पानी तक सीमित नहीं है। वे शिक्षित हैं—उन्होंने आठवीं तक गांव में और फिर इच्छापुर में पढ़ाई की है। उन्हें समाज कल्याण विभाग से एक बैटरी चालित ट्राईसाइकिल (तीन पहिया वाहन) मिली थी, जो उनकी गतिशीलता का सहारा थी। लेकिन आज वह वाहन खराब होकर कबाड़ में तब्दील हो चुका है।
जब उन्होंने इसे ठीक कराने की गुहार लगाई, तो उन्हें विभागीय दफ्तरों के चक्कर काटने को कहा गया। एक दिव्यांग महिला, जिसके पास आय का कोई ठोस जरिया नहीं है और जो चलने में असमर्थ है, उसके लिए जिला मुख्यालय के चक्कर काटना असंभव है। पंचायत स्तर पर भी उन्हें कोई सहयोग नहीं मिला, जिससे प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
कब थमेगा यह संघर्ष?
जामगुड़ा की यह कहानी केवल दुलमा कश्यप की व्यथा नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था का आईना है जहाँ योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन क्रियान्वयन के अभाव में दम तोड़ देती हैं। 'अंतिम व्यक्ति तक विकास' का नारा तब तक खोखला है, जब तक दुलमा जैसी महिलाओं को पानी के एक लोटे के लिए सड़क पर घुटनों के बल रेंगना पड़ रहा है।
बस्तर प्रशासन और सरकार को अब कागजों से बाहर निकलकर जामगुड़ा की तपती सड़क पर उतरना होगा। दुलमा को एक नए सहायक वाहन और गांव को चालू पेयजल व्यवस्था की तत्काल आवश्यकता है। सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार जागेंगे, या फिर एक और वीडियो वायरल होने का इंतजार करेंगे?
