नई दिल्ली से प्रिंट और टीवी मीडिया के जरिए लंबे समय तक अपनी शोधपरक और बेबाक विश्लेषणात्मक पत्रकारिता से अपनी पहचान बनाने वाले वरिष्ठ पत्रकार मलय बेनर्जी का कीर्तिमान कार्यालय आगमन एक औपचारिक मुलाकात नहीं, यह पत्रकारिता के वर्तमान और भविष्य पर गंभीर मंथन का अवसर बन गया। संस्थान के संस्थापक डॉ. नीरज गजेंद्र के साथ हुई यह चर्चा कई मायनों में उस बदलाव को रेखांकित करती है, जो आज मीडिया जगत के केंद्र में खड़ा है।
चर्चा का सबसे अहम बिंदु पत्रकारिता
का मिशन से कमीशन की ओर झुकाव रहा। मलय बेनर्जी ने साफ शब्दों में कहा कि एक समय
था जब पत्रकारिता का उद्देश्य समाज को जागरूक करना, सत्ता से सवाल पूछना और जनहित को
सर्वोपरि रखना होता था। लेकिन आज के दौर में सूचना का प्रवाह तेज जरूर हुआ है,
पर उसकी विश्वसनीयता और नीयत पर सवाल खड़े हो रहे हैं। उन्होंने
चिंता जताई कि जब खबरें उत्पाद बन जाएं और दर्शक सिर्फ
उपभोक्ता, तब पत्रकारिता का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
डॉ. नीरज गजेंद्र ने भी इस बात
से सहमति जताते हुए कहा कि डिजिटल युग ने अवसर तो दिए हैं, लेकिन साथ ही
चुनौतियां भी बढ़ाई हैं। अब हर व्यक्ति के हाथ में मीडिया का साधन है, लेकिन हर कोई पत्रकार नहीं है। ऐसे में सत्य और अर्धसत्य के बीच की रेखा
धुंधली होती जा रही है। उन्होंने कीर्तिमान जैसे मंचों की भूमिका को रेखांकित करते
हुए कहा कि आज आवश्यकता है एक ऐसे विश्वसनीय प्लेटफॉर्म की, जो
निष्पक्षता और जिम्मेदारी के साथ खबरों को प्रस्तुत करे।
दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने
अपने-अपने अनुभव साझा करते हुए देश के विभिन्न हिस्सों में निभाए गए पत्रकारिता के
दायित्वों को याद किया। यह अनुभव घटनाओं का विवरण होने के साथ यह उन मूल्यों की
पुनःस्थापना की कोशिश थी, जिन पर पत्रकारिता की नींव टिकी है।
मलय बेनर्जी ने अपने आध्यात्मिक
और वैचारिक पक्ष की चर्चा करते हुए बताया कि वे ईश्वर अनुसंधान केंद्र के माध्यम
से सनातन सत्यम विषय पर वीडियो श्रृंखला भी जारी करते हैं, जिसमें धर्म और
अध्यात्म के गूढ़ पहलुओं को आधुनिक संदर्भ में समझाने का प्रयास किया जाता है।
उनका मानना है कि पत्रकारिता और अध्यात्म दोनों का अंतिम उद्देश्य सत्य की खोज ही है,
बस माध्यम अलग-अलग होते हैं।
इस संवाद का सार यही है कि पत्रकारिता आज एक चौराहे पर खड़ी है। एक ओर बाजार का दबाव है, तो दूसरी ओर समाज के प्रति जिम्मेदारी। ऐसे में आवश्यकता है संतुलन और विवेक की। कीर्तिमान जैसे मंच यदि अपने मूल्यों पर अडिग रहते हैं, तो निश्चित ही वे इस बदलते दौर में एक नई दिशा देने में सक्षम होंगे।
