सड़कें आवाजाही के लिए होती हैं, उजाड़ने के लिए नहीं, यह एक वाक्य नहीं द्वारतराकला, नवाडीह और भलेसर के आदिवासी परिवारों का दर्द है, जो इन दिनों विकास के नाम पर अपनी पीढ़ियों की विरासत खोते देख रहे हैं। कीर्तिमान टीम की ग्राउंड रियलिटी चेक में जो तस्वीर सामने आई, वह बेहद चिंताजनक है। कोमाखान जंगल पट्टी क्षेत्र में द्वारतराकला से नवाडीह होते हुए भलेसर तक करीब 4 किलोमीटर सड़क निर्माण किया जा रहा है। लेकिन मौके पर न तो कोई सूचना पटल लगा है और न ही यह स्पष्ट है कि यह निर्माण किस विभाग, योजना या बजट के तहत किया जा रहा है।
जिन पेड़ों से घर चलता था, आज वे मिट्टी में तब्दील
नवाडीह के निवासी हेमलाल बरिहा की आंखों में आंसू और शब्दों में दर्द साफ झलकता है। वे बताते हैं कि चार दिन पहले तक हम महुआ और तेंदू का संग्रह कर रहे थे। हमारे परिवार के पास पांच पेड़ थे, जिससे इस साल अब तक 25 हजार रुपए की आमदनी हो चुकी थी। आगे और उम्मीद थी, लेकिन आज सुबह पहुंचे तो सब कुछ खत्म हो चुका था, हमारे पूर्वजों के पेड़ जेसीबी से जड़ समेत उखाड़ दिया गया है। ग्रामीणों के अनुसार, इस इलाके में सैकड़ों फलदार और वनोपज देने वाले पेड़ जैसे महुआ, तेंदू और चार को बिना किसी पूर्व सूचना के काट दिया गया।
वनोपज ही है जंगल के रहवासियों के जीवन का आधार
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता भूखनलाल सिन्हा बताते हैं कि 25 किमी के दायरे में लाखों पेड़ आदिवासी परिवारों की आजीविका का आधार रहे हैं। ये पेड़ क्षेत्र के लिए सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि यहां रहने वाले सैंकड़ों परिवारों के पूर्वजों की धरोहर हैं। गर्मी के मौसम में यही वनोपज परिवारों की सालभर की आर्थिक रीढ़ बनती है। ऐसे में पेड़ों का अचानक खत्म हो जाना पर्यावरणीय नुकसान के साथ पूरे सामाजिक ढांचे पर सीधा प्रहार है।
गांव के भीष्मपिता यादव कहते हैं कि जिनके पास पेड़ होते हैं, वे गांव में रहकर परिवार चलाते हैं। जिनके पास नहीं होते, उन्हें पलायन करना पड़ता है। ये ऐसे पेड़ हैं जो आदिवासियों का प्राकृतिक खजाना बनकर उन्हें सहारा देते हैं। इन पेड़ों से होने वाली आय से ही आदिवासी अपने बच्चों की शादियां करते हैं, गहने खरीदते हैं और पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। यह हमला सिर्फ प्रकृति पर नहीं, एक पूरी आर्थिक व्यवस्था पर है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
जिस मार्ग पर नई सड़क बनाई जा रही है, वहां पहले से डामरीकृत सड़क मौजूद है
ग्रामीणों के अनुसार, इस नए मार्ग का उपयोग बहुत कम होता है
स्थानीय लोगों ने आशंका जताई है कि—
यह सड़क ओडिशा सीमा के रास्ते अवैध कारोबार को आसान बनाने के लिए बनाई जा रही हो सकती है, क्योंकि पहले कच्चे रास्ते में गाड़ियां फंस जाती थीं।
पेड़ शिफ्ट किया जाना चाहिए -
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. विश्वनाथ पाणीग्रही कहते हैं कि पेड़ों को जड़ से उखाड़ फेंकना बेहद आपत्तिजनक है, यदि पेड़ सड़क निर्माण में बाधक थे तो उन्हें कहीं शिफ्ट किया जा सकता था, इस पर जांच होनी चाहिए कि आखिर यह मनमानी किसने और किसके कहने पर की।
प्रशासन से बड़ा सवाल : बिना सूचना पटल के निर्माण क्यों कराई जा रही है।दसैकड़ों पेड़ों की कटाई की अनुमति आखिर किसने दी। क्या सड़क बनाने पर्यावरणीय मंजूरी ली गई है। प्रभावित परिवारों की आमदनी को बनाए रखने की क्या योजना है।
द्वारतराकला, नवाडीह और भलेसर की यह कहानी एक सड़क निर्माण की नहीं है, उस संघर्ष की है जहां विकास और अस्तित्व आमने-सामने खड़े हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस सवाल का जवाब देता है या नहीं या विकास के नाम पर आदिवासियों की जड़ों को ही उखाड़ दिया जाएगा।
