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वाग्देवी सरस्वती का मंदिर
वाग्देवी सरस्वती का मंदिर
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हाई कोर्ट का फैसला : भोजशाला परिसर में हिंदुओं को पूजा का अधिकार, हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

इंदौर हाई कोर्ट ने धार भोजशाला विवाद पर बड़ा फैसला सुनाते हुए परिसर को देवी वाग्देवी सरस्वती का मंदिर माना है। कोर्ट ने कहा कि हिंदुओं की पूजा-अर्चना यहां लगातार होती रही है और उन्हें पूजा का अधिकार प्राप्त है। हाई कोर्ट ने वर्ष 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी गई थी। अदालत ने एएसआई सर्वे पर संतोष जताते हुए भोजशाला को राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा केंद्र भी माना। साथ ही परिसर के प्रबंधन का अधिकार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पास रहने की बात कही गई है।

कीर्तिमान डेस्क
कीर्तिमान डेस्क
15 May 2026, 05:13 PM
मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला विवाद मामले में इंदौर हाई कोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने भोजशाला परिसर को देवी वाग्देवी सरस्वती का मंदिर माना है और कहा है कि हिंदुओं को यहां पूजा-अर्चना करने का अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सर्वे रिपोर्ट पर संतोष जताते हुए कहा कि परिसर का धार्मिक और ऐतिहासिक स्वरूप मंदिर के रूप में स्थापित होता है। इस फैसले को लेकर प्रदेशभर में चर्चाएं तेज हो गई हैं।

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में अयोध्या राम मंदिर मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह प्राचीन स्मारकों, ऐतिहासिक महत्व के मंदिरों और सभी धार्मिक स्थलों के संरक्षण को सुनिश्चित करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक विरासत और ऐतिहासिक पहचान की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है।

‘हिंदुओं की पूजा-अर्चना कभी बंद नहीं हुई’

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों और साहित्य से यह साबित होता है कि भोजशाला परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है। कोर्ट ने यह भी माना कि यहां हिंदुओं की पूजा-अर्चना लगातार जारी रही और यह परंपरा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। अदालत ने कहा कि भोजशाला का धार्मिक स्वरूप देवी वाग्देवी सरस्वती के मंदिर के रूप में स्थापित होता है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद का विवादित परिसर 18 मार्च 1904 से संरक्षित स्मारक घोषित है और वर्ष 1958 के प्रावधानों के तहत इसका संरक्षण किया जा रहा है। अदालत ने कहा कि परिसर के प्रबंधन और संरक्षण का अधिकार पूरी तरह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पास रहेगा। साथ ही केंद्र सरकार और एएसआई को भोजशाला मंदिर और संस्कृत शिक्षण केंद्र से जुड़े मामलों में आवश्यक निर्णय लेने के निर्देश दिए गए हैं।

मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति वाला आदेश रद्द

हाई कोर्ट ने वर्ष 2003 में जारी उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें मुस्लिम समुदाय को परिसर में नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी और हिंदुओं के पूजा अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया गया था। अदालत ने कहा कि वह आदेश विवादित था और वर्तमान तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर उसे रद्द किया जाता है। इस फैसले के बाद मामले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। हिंदू पक्ष के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि कोर्ट ने भोजशाला को राजा भोज और देवी वाग्देवी से जुड़ा स्थल माना है। उन्होंने कहा कि अब लंदन के संग्रहालय में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग और मजबूत होगी। कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सुझाव दिया है कि वे सरकार को आवेदन देकर वैकल्पिक भूमि की मांग कर सकते हैं, जिस पर सरकार विचार करेगी।

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