मछली पालन, कृषि और छोटे व्यवसाय आज ग्रामीण भारत में महिलाओं के लिए आर्थिक मजबूती और आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बनते जा रहे हैं। विशेषकर छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में महिलाएं सही प्रशिक्षण, सरकारी योजनाओं और समूह आधारित काम के जरिए न केवल अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं, बल्कि समाज में नई पहचान भी बना रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत किए जा रहे प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर तेजी से बढ़े हैं, जिससे महिलाएं और युवा आर्थिक रूप से सशक्त होकर दूसरों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं।
जिले में कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी के निर्देशन तथा जिला पंचायत सीईओ नयनतारा सिंह तोमर के मार्गदर्शन में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार ठोस प्रयास किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों को मजबूत किया जा रहा है, जिससे ग्रामीण महिलाएं संगठित होकर स्वरोजगार से जुड़ सकें। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप गांव-गांव में आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं और महिलाएं अपने परिवार की आय में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
उमा सिंह बनीं ग्रामीण विकास की प्रेरक मिसाल
जनपद पंचायत बलरामपुर के ग्राम महाराजगंज की निवासी उमा सिंह आज ग्रामीण महिलाओं के लिए एक जीवंत प्रेरणा बनकर उभरी हैं। वे गुलाब महिला स्व-सहायता समूह की सक्रिय सदस्य हैं और समूह से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया है। समूह की मदद से उन्हें चक्रीय निधि, सामुदायिक निवेश कोष और बैंक लिंकेज के माध्यम से कुल 85 हजार रुपये का ऋण प्राप्त हुआ, जिससे उन्होंने अपने आजीविका के साधनों को विस्तार दिया।
कृषि और मत्स्य पालन से बढ़ी आय, बनी ‘लखपति दीदी’
उमा सिंह ने इस राशि का उपयोग कृषि और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में किया, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति लगातार मजबूत होती गई। उन्होंने 2.5 एकड़ भूमि में धान और 1.5 एकड़ भूमि में मक्का की खेती की, जिससे उन्हें अच्छी पैदावार और आय प्राप्त हुई। इसके अलावा, उन्होंने अपनी निजी डबरी में मछली बीज डालकर मत्स्य पालन की शुरुआत की, जो अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन गया।
कृषि कार्यों के साथ-साथ वे हर शाम महाराजगंज चौक में चना-चाट की दुकान भी चलाती हैं, जिससे उन्हें नियमित रूप से अतिरिक्त आमदनी प्राप्त हो रही है। इस वर्ष उनकी आय के आंकड़े भी उल्लेखनीय रहे—धान बिक्री से 1 लाख 42 हजार रुपये, मक्का से 16 हजार रुपये तथा मत्स्य पालन से 20 हजार रुपये की आय अर्जित हुई। इन सभी गतिविधियों के चलते उमा सिंह अब गांव में “लखपति दीदी” के रूप में पहचानी जाने लगी हैं।
अन्य महिलाओं के लिए बनी प्रेरणा की मिसाल
उमा सिंह की सफलता ने आसपास के गांवों की महिलाओं को भी प्रेरित किया है। अब अन्य महिलाएं भी स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर उन्नत खेती, पशुपालन, मत्स्य पालन और छोटे व्यवसायों की ओर कदम बढ़ा रही हैं। इस बदलाव से न केवल महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है, बल्कि गांवों की समग्र अर्थव्यवस्था में भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। ग्रामीण स्तर पर यह पहल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम साबित हो रही है, जिससे महिलाओं का आत्मविश्वास और बढ़ रहा है और वे परिवार की आर्थिक रीढ़ बन रही हैं।
