छत्तीसगढ़ के युवा फिल्म निर्देशक एस अंशु धुरंधर की चर्चित डॉक्यूमेंट्री फिल्म “छत्तीसगढ़ के भीम चिंताराम” ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। फिल्म का चयन यूक्रेन में आयोजित प्रतिष्ठित आई.सी.जे. अवॉर्ड 2026 के लिए किया गया है। यह सम्मान इंटरनेशन कल्चर जर्नल द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रदान किया जाएगा, जहां दुनिया भर से आई हजारों फिल्मों के बीच इस डॉक्यूमेंट्री ने अपनी अलग पहचान बनाई है।
फेस्टिवल आयोजकों के मुताबिक, इस वर्ष लगभग 2,500 से अधिक फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री परियोजनाओं की समीक्षा की गई। इनमें एस अंशु धुरंधर की प्रस्तुति ने अपनी गहन रिसर्च, प्रभावशाली स्टोरीटेलिंग, संवेदनशील प्रस्तुति और मजबूत तकनीकी गुणवत्ता के कारण निर्णायक मंडल का विशेष ध्यान आकर्षित किया।
सिनेमाई दस्तावेज
जूरी ने कहा कि “छत्तीसगढ़ के भीम चिंताराम” केवल एक जीवनी आधारित फिल्म नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, जनस्मृतियों और सामाजिक इतिहास को वैश्विक मंच तक पहुंचाने वाला महत्वपूर्ण सिनेमाई दस्तावेज है। फिल्म में दाऊ चिंताराम के जीवन को केवल उनकी असाधारण शारीरिक क्षमता तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि समाज सेवा, शिक्षा, धार्मिक संरक्षण और मानवीय मूल्यों से जुड़े उनके योगदान को भी गंभीरता और संतुलन के साथ प्रस्तुत किया गया है।
13 अध्यायों में विभाजित इस डॉक्यूमेंट्री में चिंताराम के बचपन, संघर्ष, सामाजिक नेतृत्व, मजदूरों और गरीबों के प्रति समर्पण, शिक्षा और धार्मिक कार्यों को विस्तार से दिखाया गया है। फिल्म में तुरतुरिया मंदिर के जीर्णोद्धार और ग्रामीण समाज में उनके प्रभाव को भी प्रमुखता से उभारा गया है। यह डॉक्यूमेंट्री दर्शाती है कि किस प्रकार एक साधारण ग्रामीण परिवेश से निकला व्यक्ति अपने कर्म और सेवा के बल पर जनमानस में “छत्तीसगढ़ के भीम” के रूप में स्थापित हुआ।
फेस्टिवल टीम ने फिल्म की रिसर्च और प्रस्तुति शैली को इसकी सबसे बड़ी ताकत बताया है। बड़ी संख्या में लिए गए साक्षात्कारों को जिस गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ संपादित कर प्रस्तुत किया गया है, वह निर्देशक एस अंशु धुरंधर की परिपक्व सिनेमाई दृष्टि को दर्शाता है। फिल्म में ग्रामीणों, मजदूरों, समाज के वरिष्ठ लोगों, शोधकर्ताओं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर से जुड़े व्यक्तियों के विचार शामिल किए गए हैं, जिससे यह प्रस्तुति एक सामाजिक और ऐतिहासिक दस्तावेज का रूप लेती है।
भावनात्मक प्रभाव
तकनीकी पक्ष की बात करें तो दृश्य संयोजन, नैरेशन, बैकग्राउंड म्यूजिक, साउंड डिजाइन और भावनात्मक प्रस्तुति को जूरी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर का बताया है। विशेष रूप से अंतिम हिस्से में कवि एवं गायक मीर अली मीर द्वारा प्रस्तुत गीत की काफी सराहना की गई, जिसने फिल्म के भावनात्मक प्रभाव को और गहरा बना दिया है।
इस डॉक्यूमेंट्री का निर्माण वज्र विज़न स्टूडियो के बैनर तले किया गया है। निर्देशन, रिसर्च और नैरेशन स्वयं एस अंशु धुरंधर ने किया है। कैमरा संचालन प्रमोद गिलहरे ने संभाला, जबकि संपादन का कार्य अरविंद वर्मा ने किया।
यूक्रेन के 100 विद्यालयों में भी प्रदर्शित
फेस्टिवल आयोजकों के अनुसार, फिल्म का विशेष प्रदर्शन 14 मई 2026 को उद्घाटन समारोह के दौरान किया जाएगा। साथ ही इसे रेड कार्पेट प्रस्तुति के लिए भी चुना गया है। यह आयोजन यूक्रेन के ऐतिहासिक स्थल उज्होरोड काशल में आयोजित होगा, जिसे वहां की प्रमुख सांस्कृतिक धरोहरों में गिना जाता है।
सबसे खास बात यह है कि इस डॉक्यूमेंट्री को “सिनेमा इन स्कूल” कार्यक्रम के अंतर्गत यूक्रेन के लगभग 100 विद्यालयों में भी प्रदर्शित किया जाएगा। आयोजकों का मानना है कि यह फिल्म नई पीढ़ी को समाज सेवा, संघर्ष, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं के महत्व को समझने की प्रेरणा देगी।
फिल्म जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि एस अंशु धुरंधर की यह उपलब्धि वर्षों की मेहनत, संघर्ष और रचनात्मक समर्पण का परिणाम है। कम उम्र में लेखन से शुरुआत करने वाले धुरंधर ने 16 वर्ष की आयु में फिल्म निर्माण की दुनिया में कदम रखा था। अब तक उनके कार्यों को भारत के 10 राज्यों सहित अमेरिका, यूक्रेन, जमैका, श्रीलंका और नेपाल में 25 से अधिक सम्मान मिल चुके हैं।
