अक्षय तृतीया, जिसे ग्रामीण अंचलों में अक्ति पर्व के नाम से जाना जाता है, आज 19 अप्रैल को गांव-गांव में पारंपरिक उत्साह और सांस्कृतिक रंगों के साथ मनाया जा रहा है। इस अवसर पर बच्चों द्वारा निभाई जाने वाली पुतला-पुतली की अनोखी और रसमय शादी की परंपरा पूरे क्षेत्र में विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहता है। सुबह से ही घरों और आंगनों में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिलता है। छोटे-छोटे बच्चे विशेषकर बालिकाएं, अपने-अपने गुड्डे-गुड़ियों को बड़े प्रेम और उत्साह के साथ दूल्हा-दुल्हन की तरह सजाते हैं। उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं, आभूषणों से सजाया जाता है और पूरे विधि-विधान के साथ विवाह की तैयारी की जाती है।
इसके बाद गांव की गलियों में ढोलक-थाली की थाप पर छोटी-छोटी बारात निकाली जाती है। बच्चे पारंपरिक गीत गाते हुए, नाचते-गाते हुए इस प्रतीकात्मक विवाह उत्सव का आनंद लेते हैं। बारात में हल्दी की रस्म, मंडप सजाना, फेरे लगाना और विदाई जैसी सभी पारंपरिक विवाह प्रक्रियाएं पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ निभाई जाती हैं। यह पूरा आयोजन बच्चों के लिए एक खेल के साथ-साथ संस्कृति से जुड़ने का जीवंत अनुभव भी बन जाता है।
इस अवसर पर गांव के बड़े-बुजुर्ग भी उत्साहपूर्वक शामिल होते हैं। वे बच्चों को आशीर्वाद देते हैं और इस दृश्य को देखकर अपने बचपन की यादों में खो जाते हैं। यह परंपरा न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाला एक सांस्कृतिक सेतु भी है। अक्षय तृतीया को हिंदू परंपरा में अत्यंत शुभ दिन माना जाता है, जिस दिन नए कार्यों की शुरुआत करना मंगलकारी समझा जाता है। इसी दिन किसान भी खेती-किसानी से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत करते हैं। ग्रामीण जीवन में इस पर्व का विशेष महत्व है, क्योंकि यह प्रकृति, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
अक्ति पर्व की यह परंपरा ग्रामीण अंचलों में आज भी जीवित है और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। गांवों में आज फिर मासूम खुशियों, पारंपरिक रस्मों और सांस्कृतिक विरासत का सुंदर और जीवंत संगम देखने को मिल रहा है।
