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लाइफस्टाइल के मामले में बहुत बड़ा यू-टर्न
लाइफस्टाइल के मामले में बहुत बड़ा यू-टर्न
लाइफ स्टाइल

सुपरफास्ट लाइफ से तौबा : स्लो लिविंग और नर्वस सिस्टम हीलिंग का बढ़ा क्रेज, जानें क्या है नया ट्रेंड

दुनिया भर में लाइफस्टाइल का ट्रेंड तेजी से बदल रहा है। लोग अब दिखावे, अत्यधिक व्यस्तता और परफेक्शन की दौड़ से दूर होकर मानसिक शांति, सादगी और संतुलित जीवन को प्राथमिकता दे रहे हैं। "स्लो मॉर्निंग्स" और "सॉफ्ट इवनिंग्स" जैसी आदतें लोकप्रिय हो रही हैं, जहां लोग दिन की शुरुआत और अंत बिना डिजिटल व्यवधान के शांत माहौल में बिताना पसंद कर रहे हैं।

कीर्तिमान न्यूज
01 Jun 2026, 02:17 PM
मुंबई

पिछले कुछ सालों से इंसानी जिंदगी जिस रफ्तार से भाग रही थी, अब उस पर एक ठहराव सा आने लगा है। सोशल मीडिया पर हर वक्त परफेक्ट दिखने और खुद को चौबीसों घंटे 'बिजी' रखने की होड़ से लोग अब थक चुके हैं। इस साल लाइफस्टाइल के मामले में एक बहुत बड़ा यू-टर्न देखने को मिल रहा है। दिखावे और 'ओवर-ऑप्टिमाइजेशन' (हर चीज़ में परफेक्ट होने की जिद) को छोड़कर लोग अब मानसिक शांति, सादगी और अपने शरीर की वास्तविक ज़रूरतों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

ग्लोबल वैलनेस समिट (GWS) और हालिया लाइफस्टाइल सर्वे के अनुसार, इस समय दुनिया भर में कौन से बड़े बदलाव आ रहे हैं और आज का इंसान अपनी जिंदगी कैसे जी रहा है, आइए इस पर एक विस्तृत नज़र डालते हैं:

'स्लो मॉर्निंग्स और सॉफ्ट इवनिंग्स' का नया फॉर्मूला

सुबह उठते ही फोन की स्क्रीन देखना या काम के पीछे भागना अब पुराना फैशन हो चुका है। अब लोग 'स्लो मॉर्निंग्स' (Slower Mornings) अपना रहे हैं, जहां सुबह का पहला एक घंटा बिना किसी गैजेट के, हल्की स्ट्रेचिंग, डायरी लिखने या चाय-कॉफी की चुस्कियों के साथ शांति से बिताया जा रहा है।

ठीक इसी तरह, रात को काम के तनाव से सीधे बिस्तर पर गिरने के बजाय 'सॉफ्ट इवनिंग्स' (Softer Evenings) का चलन बढ़ा है। इसमें लोग सोने से 2 घंटे पहले लाइट डिम (कम) कर देते हैं, स्क्रीन टाइम बंद कर देते हैं और दिमाग को शांत करने के लिए किताबें पढ़ते हैं या संगीत सुनते हैं।

'नर्वस सिस्टम रेगुलेशन' है नया वैलनेस मंत्र

अब तक फिटनेस का मतलब सिर्फ जिम जाना और कैलोरी बर्न करना समझा जाता था, लेकिन अब फोकस 'दिमाग और नसों को शांत रखने' (Nervous System Regulation) पर आ गया है।

  • टॉक थेरेपी और ब्रीथवर्क: तनाव और एंग्जायटी से बचने के लिए लोग 'डीप ब्रीथिंग' (गहरी सांस लेने की तकनीक) और 'सॉमेटिक रिलीज' (शरीर के खिंचाव से तनाव दूर करना) को अपनी डेली लाइफ का हिस्सा बना रहे हैं।

  • सोशल सौना और कोल्ड प्लंज: शरीर को रिकवर करने के लिए हॉट सौना बाथ और ठंडे पानी में नहाने (Cold Exposure) का ट्रेंड इस समय युवाओं में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।

आधुनिकता के बीच जड़ों की ओर वापसी

तकनीकी रूप से हम जितने आगे बढ़ रहे हैं, अपनी संस्कृति के उतने ही करीब आ रहे हैं। इस लाइफस्टाइल को 'फ्यूचर ट्रेडिशन' (Future Tradition) का नाम दिया गया है। भारत समेत पूरे एशिया में युवा अपनी परंपराओं को छोड़ नहीं रहे हैं, बल्कि उन्हें आधुनिक और आसान बना रहे हैं।

उदाहरण के लिए, दिवाली पर पारंपरिक दीयों के साथ-साथ स्मार्ट और सेफ एलईडी लाइट्स का इस्तेमाल, त्योहारों पर दूर बैठे परिवार से लाइव-स्ट्रीमिंग के जरिए जुड़ना और पहनावे में ट्रेडिशनल फैब्रिक को मॉडर्न स्ट्रीटवियर (जैसे खादी या हैंडलूम के मॉडर्न जैकेट्स) के रूप में कैरी करना आज की पीढ़ी की पहली पसंद बन गया है।

फैशन और ब्यूटी में 'कम मगर बेहतर' 

कपड़ों और सजने-संवरने के मामले में भी लोग अब 'फास्ट फैशन' (सस्ते और जल्दी खराब होने वाले कपड़े) से दूरी बना रहे हैं।

  • वार्डरोब मिनिमलिज्म: अब लोग ऐसे कपड़े खरीद रहे हैं जो टिकाऊ हों, आरामदायक हों और जिन्हें अलग-अलग मौकों पर मिक्स-एंड-मैच करके पहना जा सके। सात्विक और न्यूट्रल कलर्स (जैसे सेज ग्रीन, अर्थी ब्राउन और स्काई ब्लू) ट्रेंड में हैं।

  • स्किन लॉन्जिविटी (Skin Longevity): ब्यूटी इंडस्ट्री से अब 'एंटी-एजिंग' (उम्र छुपाने) शब्द गायब हो रहा है। इसकी जगह 'स्किन लॉन्जिविटी' यानी त्वचा को अंदर से स्वस्थ और चमकदार बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है, जिसमें केमिकल के बजाय बायोटेक और नेचुरल प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल हो रहा है।

डिजिटल डिटॉक्स और 'एनालॉग हॉबीज' का पुनर्जन्म

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और स्क्रीन की दुनिया से ऊबकर लोग अब ऐसी हॉबीज चुन रहे हैं जिसमें उनके हाथों का इस्तेमाल हो और स्क्रीन से दूरी बने। डायरी लिखना, मिट्टी के बर्तन बनाना (Ceramics), पेंटिंग करना, गार्डनिंग और हाथों से बुनाई करने जैसी एनालॉग हॉबीज (Analog Hobbies) का चलन बहुत तेजी से बढ़ा है। लोग जानबूझकर हफ्ते में एक दिन 'डिजिटल डिटॉक्स' (फोन-इंटरनेट से पूरी तरह दूरी) रख रहे हैं।

'प्लांट-बेस्ड प्रोटीन' और ईटिंग पैटर्न्स

खान-पान में अब लोग इस बात को लेकर बेहद सतर्क हैं कि वे क्या खा रहे हैं। रात के खाने में रेड मीट या भारी खाने की जगह प्लांट-बेस्ड प्रोटीन (जैसे दालें, टोफू, ओट्स) को तरजीह दी जा रही है, ताकि नींद की क्वालिटी (Sleep Quality) बेहतर हो सके। इसके साथ ही, गट-हेल्थ (पेट की सेहत) को दुरुस्त रखने के लिए प्रोबायोटिक फूड्स का सेवन रूटीन का हिस्सा बन चुका है।

निष्कर्ष: कुल मिलाकर कहें तो आज का लाइफस्टाइल "दुनिया को दिखाने" के लिए नहीं, बल्कि "खुद को बेहतर महसूस कराने" के लिए री-डिजाइन हो रहा है। सफलता का पैमाना अब इस बात से नहीं मापा जा रहा कि आप कितने व्यस्त हैं, बल्कि इससे मापा जा रहा है कि आप अंदर से कितने शांत और खुश हैं।

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