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चंडी माता
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चण्डी माता:  प्रकृति का सौंदर्य मिलकर रचते हैं अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के घुंचापाली की पहाड़ियों में स्थित चण्डी डोंगरी आस्था, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। यहां मां चण्डी की 21 फीट ऊंची प्रतिमा, प्राचीन पूजा परंपराएं, रहस्यमयी कथाएं और जनसहयोग से विकसित भव्य मंदिर श्रद्धालुओं को गहरा आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करते हैं।

कीर्तिमान ब्यूरो
कीर्तिमान ब्यूरो
02 Apr 2026, 12:47 PM
महासमुंद
जल्द आ रहा है सारांश सुनने की सुविधा जल्द उपलब्ध होगी

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के अंतर्गत घुंचापाली (बागबाहरा) की सुरम्य पहाड़ियों के बीच स्थित चण्डी डोंगरी आज आस्था, विश्वास और अध्यात्म का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। घने जंगलों और शांत वातावरण से घिरा यह स्थल न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। नगर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित यह पवित्र धाम आज हजारों लोगों की आस्था का केंद्र बन चुका है।

मंदिर की स्थापना

1965 में मां चंडी के प्राचीन मूर्ति की खोज के बाद स्थानीय भक्तों द्वारा एक छोटे मंदिर की स्थापना की गई। इस प्राचीन मूर्ति को स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार कई सदियों पुराना माना जाता है। बढ़ती भक्तों की संख्या के कारण 1980 में मंदिर का पहला बड़ा विस्तार किया गया। इस विस्तार के दौरान मुख्य मंदिर भवन, यज्ञशाला और भक्तों के लिए विश्राम कक्ष का निर्माण किया गया।

जनसहयोग से बना भव्य मंदिर

निर्जन वन क्षेत्र में स्थित इस पहाड़ी पर मां चण्डिका की विशाल प्रस्तर प्रतिमा के लिए भव्य मंदिर का निर्माण श्री चण्डी माता मंदिर समिति, घुंचापाली के अथक प्रयासों से संभव हुआ है। मंदिर परिसर में यज्ञशाला, ज्योति-गृह और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं विकसित की गई हैं। आने वाले समय में यहां प्रवचन स्थल और धर्मशाला निर्माण की योजना भी प्रस्तावित है, जिससे यह स्थल और अधिक सुदृढ़ धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित होगा।

21 फीट ऊंची दिव्य प्रतिमा बनी आकर्षण का केंद्र

मां चण्डी की लगभग 21 फीट ऊंची विशाल प्रस्तर प्रतिमा यहां का प्रमुख आकर्षण है। देवी का रौद्र और दक्षिणा-भिमुखी स्वरूप श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखता है। उन्हें दैवीय आपदाओं से रक्षा करने वाली मातृशक्ति के रूप में पूजा जाता है। प्रतिमा की दिव्यता और भव्यता श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।

डेढ़ सौ वर्षों की अखंड आराधना

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस स्थल पर लगभग 150 वर्षों से माता की पूजा-अर्चना होती आ रही है। प्रारंभिक समय में यह क्षेत्र आदिवासी गोंड समुदाय के प्रभाव में था, जहां वाममार्गीय पूजा पद्धति प्रचलित थी और महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। लेकिन वर्ष 1950-51 के आसपास वैदिक पद्धति से पूजा प्रारंभ होने के बाद परंपराओं में बदलाव आया और अब महिलाएं भी समान रूप से पूजा में सहभागी बनती हैं।

दंतकथाओं में जीवित है आस्था

चण्डी डोंगरी से जुड़ी कई रहस्यमयी और चमत्कारी कथाएं स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित हैं। लोगों का कहना है कि उन्होंने पहाड़ियों से निकलते तेज पुंज को नृत्य करते हुए माता की प्रतिमा में समाहित होते देखा है। यही कारण है कि यह स्थल धीरे-धीरे ‘सिद्ध पीठ’ के रूप में प्रसिद्ध होता जा रहा है।

स्वप्न में मिला मंदिर निर्माण का संकेत

कहा जाता है कि बागबाहरा निवासी जोहन राम साहू को स्वप्न में मंदिर निर्माण का संकेत प्राप्त हुआ था। इसके बाद जनसहयोग से इस भव्य मंदिर का निर्माण संभव हुआ। आज मंदिर के सामने विशाल यज्ञशाला और हजारों दीप प्रज्ज्वलन के लिए निर्मित ज्योति-गृह इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं।

गागर में सागर’ जैसा चमत्कारी कुआं

मंदिर के नीचे स्थित एक छोटा सा कुआं, जो लगभग 5 फीट चौड़ा और 5 फीट गहरा है, कभी सूखता नहीं। भीषण गर्मी में भी यह पूरे गांव की जल आवश्यकताओं को पूरा करता है। इससे जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब एक किसान ने इस कुएं को पाटने का प्रयास किया, तो उसके पशुओं की मृत्यु हो गई। इसे देवी का कोप माना गया और बाद में कुएं को पुनः साफ करने पर स्थिति सामान्य हो गई।

आस्था के साथ नैतिकता का संदेश

एक अन्य कथा में बताया जाता है कि मंदिर में अर्पित आभूषणों की चोरी करने वाला सुनार मानसिक संतुलन खो बैठा और जीवनभर उसी अवस्था में रहा। यह घटना आज भी श्रद्धालुओं को ईमानदारी और श्रद्धा का संदेश देती है।

धुकीमार पत्थर की रहस्यमयी कहानी

ढाढ़ डोंगर की पहाड़ी से गिरे एक विशाल पत्थर के पीछे भी एक रोचक कथा प्रचलित है। मान्यता है कि एक टोनही (डायन) बीमारी लेकर आ रही थी, जिसे माता ने पहचानकर उस पर पत्थर गिरा दिया, जिससे उसका अंत हो गया और क्षेत्र महामारी से मुक्त हो गया।

विशिष्ट पूजा पद्धति

माता की प्रतिमा के रौद्र और दक्षिणाभिमुखी स्वरूप के कारण यहां सामने से पूजा करना कठिन माना जाता है। इसलिए श्रद्धालु माता के चरणों की ओर से पूजा-अर्चना करते हैं। वैदिक परंपरा के बाद अब महिलाएं भी पूर्ण श्रद्धा के साथ पूजा में भाग लेती हैं।

बढ़ती आस्था, बढ़ती ज्योति

हर वर्ष यहां प्रज्ज्वलित होने वाली ज्योतियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस वर्ष लगभग एक हजार ज्योतियां प्रज्ज्वलित की गईं, जो श्रद्धालुओं की बढ़ती आस्था का प्रतीक है। विशेष रूप से चैत्र और आश्विन नवरात्र में यहां हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

संगठित समिति कर रही बेहतर प्रबंधन

मंदिर के संचालन के लिए एक संगठित समिति कार्यरत है, जिसमें अध्यक्ष, सचिव और संरक्षक सहित कई पदों पर जिम्मेदार लोग जुड़े हुए हैं। वर्ष 1995 में समिति द्वारा सहस्र चण्डी महायज्ञ का भव्य आयोजन किया गया था, जिसमें देशभर के संत-महात्माओं ने भाग लिया था।

आस्था, परंपरा और विकास का संगम

चण्डी डोंगरी आज केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और जनसहयोग का जीवंत उदाहरण बन चुका है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता

रहस्यमयी कथाएं और आध्यात्मिक ऊर्जा श्रद्धालुओं को न केवल आकर्षित करती हैं, बल्कि उन्हें एक अलौकिक अनुभव भी प्रदान करती हैं। कुल मिलाकर, घुंचापाली (बागबाहरा) का यह पावन स्थल छत्तीसगढ़ की धार्मिक विरासत को समृद्ध करने के साथ-साथ आने वाले समय में एक प्रमुख पर्यटन और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में अपनी पहचान और मजबूत करता जा रहा है।

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