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द्रविड़ पॉलिटिक्स 2.0: साउथ कनेक्शन का नया अध्याय या राष्ट्रीय राजनीति की नई धुरी

तमिलनाडु में थलपति विजय की राजनीतिक एंट्री केवल क्षेत्रीय घटना नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में साउथ कनेक्शन के नए उभार का संकेत है। उनकी द्रविड़ पॉलिटिक्स 2.0 पारंपरिक द्रविड़ विचारधारा जिसकी जड़ें ईवी रामासामी पेरियार के सामाजिक न्याय आंदोलन में हैं, उनको आधुनिक और संतुलित रूप में प्रस्तुत करती है।

कीर्तिमान ब्यूरो
कीर्तिमान ब्यूरो
06 May 2026, 10:36 AM
नई दिल्ली

तमिलनाडु की राजनीति में अभिनेता से नेता बने थलपति विजय की एंट्री एक चुनावी घटना ही नहीं यह भारतीय राजनीति के उस साउथ कनेक्शन की पुनर्समीक्षा का अवसर है, जिसे लंबे समय तक उत्तर भारतीय विमर्श में या तो नजरअंदाज किया गया या सतही तौर पर समझा गया। विजय की पार्टी टीवीके की पहली ही चुनावी सफलता ने यह संकेत दे दिया है कि दक्षिण भारत की राजनीति अब क्षेत्रीय नहीं, वैचारिक रूप से राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। लेकिन सवाल यह है कि यह द्रविड़ पॉलिटिक्स 2.0 आखिर है क्या

पहचान बनाम विचारधारा

विजय की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि हिंदू मां और ईसाई पिता उन्हें भारतीय राजनीति के उस खांचे से बाहर खड़ा करती है, जहां पहचान अक्सर एकल धार्मिक या जातीय ढांचे में परिभाषित होती है। यह मिश्रित पहचान ही उनके सेक्युलर सोशल जस्टिस मॉडल की आधारशिला बनती दिखती है। वे एक ओर ईवी रामासामी पेरियार का नाम लेते हैं, जो ब्राह्मणवाद और परंपरागत धार्मिक संरचनाओं के मुखर विरोधी रहे, तो दूसरी ओर भीमराव आंबेडकर और के. कामराज जैसे अपेक्षाकृत संतुलित सामाजिक-राजनीतिक प्रतीकों को भी साथ रखते हैं।

द्रविड़ आंदोलन की जड़ें

दक्षिण भारत की राजनीति को समझे बिना विजय की सफलता को समझना अधूरा है। 1916 की जस्टिस पार्टी से लेकर पेरियार के सेल्फ-रेस्पेक्ट मूवमेंट और फिर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के उदय तक, यह राजनीति मूलतः सामाजिक न्याय, भाषा और सांस्कृतिक स्वायत्तता के प्रश्नों से संचालित रही है। हिंदी थोपे जाने के विरोध ने 1967 में DMK को सत्ता तक पहुंचाया और तब से तमिलनाडु में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और DMK के बीच सत्ता का चक्र चलता रहा। यह राजनीति उत्तर भारत के धर्म आधारित विमर्श से भिन्न रही यहां संघर्ष जाति, भाषा और सांस्कृतिक अस्मिता का रहा, न कि केवल धार्मिक पहचान का।

सिनेमा और सत्ता का गठजोड़

दक्षिण भारतीय राजनीति में सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि वैचारिक प्रचार का माध्यम रहा है। सीएन अन्नादुरै, एम करुणानिधि और एमजी रामचंद्रन ने फिल्मों के जरिए विचारधारा को जनमानस तक पहुंचाया। विजय इसी परंपरा के आधुनिक प्रतिनिधि हैं लेकिन फर्क यह है कि वे सोशल मीडिया और युवा मुद्दों के युग में यह प्रयोग कर रहे हैं।

BJP के खिलाफ वैचारिक रेखा

विजय ने खुलकर भारतीय जनता पार्टी को वैचारिक विरोधी बताया है। यह विरोध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक है, जहां एक ओर भाजपा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और एकरूपता की बात करती है, वहीं विजय बहुलता, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय पहचान को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन वे पारंपरिक द्रविड़ नेताओं की तरह एंटी-हिंदू रुख नहीं अपनाते। मंदिरों में जाना और धार्मिक प्रतीकों से दूरी न बनाना, उनके मॉडल को अधिक व्यावहारिक और व्यापक बनाता है।

उत्तर बनाम दक्षिण, वास्तविकता या मिथक

भारतीय राजनीति में उत्तर बनाम दक्षिण का विमर्श अक्सर अतिरंजित होता है, लेकिन इसके पीछे ऐतिहासिक सच्चाई भी है। दक्षिण भारत ने हमेशा केंद्र के सांस्कृतिक वर्चस्व, खासकर भाषा और प्रशासनिक नियंत्रण का प्रतिरोध किया है। विजय का उदय इस प्रतिरोध को एक नए रूप में सामने लाता हैजहां टकराव की जगह संवाद और पुनर्परिभाषा की कोशिश दिखती है।

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