कभी नक्सली गतिविधियों और दहशत की वजह से देशभर में चर्चा में रहने वाला सुकमा जिले का पूवर्ती गांव अब बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। माड़वी हिड़मा और देवा बारसे के गांव पूवर्ती में पहली बार जनगणना का काम पूरा हुआ है। खास बात यह रही कि सुकमा जिले में सबसे पहले जनगणना पूरी करने वाला गांव भी पूवर्ती बना।
कोंटा विकासखंड के इस अतिसंवेदनशील गांव में जनगणना के प्रथम चरण का कार्य महज तीन दिनों में पूरा कर लिया गया। गांव में 234 मकान और 950 से अधिक आबादी दर्ज की गई है। यहां दो आंगनबाड़ी केंद्र और एक स्कूल संचालित है।
नक्सलियों की हलचल से पहचाना जाता था गांव
पूवर्ती गांव लंबे समय तक नक्सलियों का प्रभाव क्षेत्र माना जाता रहा। सुरक्षा कारणों से यहां प्रशासनिक पहुंच बेहद सीमित थी। गांव का नाम अक्सर नक्सली घटनाओं और मुठभेड़ों के कारण सुर्खियों में आता था।
लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। नक्सली हिड़मा के एनकाउंटर और देवा बारसे के आत्मसमर्पण के बाद प्रशासनिक अमले की पहुंच गांव तक आसान हुई है। पहली बार गांव में व्यवस्थित तरीके से जनगणना का काम हो पाया।
भाषा बनी चुनौती
जनगणना का जिम्मा संभालने वाले सहायक शिक्षक जवाराम पटेल के लिए यह काम किसी चुनौती से कम नहीं था। गांव में स्थानीय गोंडी बोली बोली जाती है, जिसकी समझ सीमित होने के कारण संवाद में दिक्कतें आईं।
इसके बावजूद उन्होंने स्थानीय शिक्षकों और ग्रामीणों की मदद ली। टीम ने घर-घर पहुंचकर जानकारी जुटाई और तय समय में पूरा सर्वे खत्म किया। कठिन परिस्थितियों के बीच रिकॉर्ड समय में काम पूरा होने को प्रशासन बड़ी उपलब्धि मान रहा है।
दूसरे कर्मचारियों के लिए प्रेरणा
सुकमा कलेक्टर अमित कुमार ने जनगणना कार्य की सराहना करते हुए कहा कि संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण इलाके में इस तरह जिम्मेदारी निभाना प्रेरणादायक है। उन्होंने जनगणना टीम की मेहनत और समर्पण की तारीफ की।
डर से विकास की ओर बढ़ता पूवर्ती
जिस गांव की पहचान कभी बंदूक और भय से होती थी, वहां अब सरकारी योजनाओं, शिक्षा और विकास की चर्चा होने लगी है। पहली बार गांव की वास्तविक आबादी और घरों का आंकड़ा सामने आने से प्रशासन को योजनाएं बनाने में भी मदद मिलेगी।
पूवर्ती में जनगणना पूरी होना सिर्फ एक सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि बदलते बस्तर और प्रशासनिक पहुंच की नई तस्वीर माना जा रहा है।
