राजनेताओं का त्याग!
प्रधानमंत्री की ईंधन बचाने वाली अपील के बाद त्याग की नई प्रतियोगिता शुरू हो गई है। मंत्री-संत्री, सांसद-विधायक सब अचानक पर्यावरण प्रेमी बन गए हैं। कोई साइकिल पर दफ्तर पहुंच रहा है, कोई ई-रिक्शा में जनता का दर्द महसूस कर रहा है, तो कोई कारपूलिंग को राष्ट्रसेवा का नया अध्याय बता रहा है। लेकिन असली दृश्य कैमरे के फ्रेम से थोड़ा बाहर दिखाई देता है। नेताजी साइकिल पर आगे-आगे निकलते हैं और पीछे उनका त्याग अमर करने पूरी टीम बाइक, कार और कैमरे लेकर दौड़ती रहती है। पांच किलोमीटर की यात्रा को ड्रोन शॉट, रील और फोटोशूट के जरिए ऐसा प्रस्तुत किया जा रहा है मानो देश के ऊर्जा संकट का समाधान मंत्रालय नहीं, सोशल मीडिया सेल निकालने वाली हो। उधर जनता पेट्रोल पंप की लाइन में खड़ी है और इधर त्याग का लाइव प्रसारण जारी है। अब आम आदमी यही समझने में लगा है कि आखिर ज्यादा ईंधन कौन बचा रहा है और ज्यादा कौन जला रहा है।
उड़नखटोले का ईंधन
ईंधन बचत के इस महाअभियान में जनता, अफसर और नेताओं को कम वाहन चलाने की सीख दी जा रही है। साइकिल अपनाने और कारपूलिंग का संदेश लगातार दिया जा रहा है। लेकिन इसी बीच सरकार का उड़नखटोला रोज आसमान में विकास यात्रा पर निकल पड़ता है। मुखिया जी का हेलीकॉप्टर सुबह उत्तर में दिखाई देता है, दोपहर तक बस्तर पहुंच जाता है और शाम होते-होते किसी दूसरे जिले में उतर जाता है।
जनता अब सोचने लगी है कि शायद यह हेलीकॉप्टर पेट्रोल-डीजल से नहीं, सीधे सुशासन से उड़ता होगा। क्योंकि अगर ईंधन बचत वास्तव में इतनी जरूरी है तो सबसे पहले नजर उड़नखटोले पर क्यों नहीं जाती? या फिर उसका ईंधन किसी विशेष श्रेणी में आता है, जहां बचत की अपील लागू नहीं होती। वैसे सरकार का तर्क भी कम दिलचस्प नहीं है, जनता लाइन में लगे तो संकट, लेकिन हेलीकॉप्टर उड़ता रहे तो विकास।
डीजी साहब और नियमों का मौसम
आखिरकार अरुण देव गौतम को प्रदेश का पूर्णकालिक डीजी बना दिया गया। हालांकि कुर्सी का सुख ज्यादा लंबा नहीं चलेगा, क्योंकि दिसंबर 2026 तक ही सेवा शेष है। यानी साहब फाइलों की धूल झाड़ते-झाड़ते रिटायरमेंट का कैलेंडर भी देखने लगेंगे। इस मामले में पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा काफी भाग्यशाली रहे। प्रभारी से पूर्णकालिक डीजी बने, फिर दो साल का कार्यकाल और ऊपर से एक्सटेंशन भी मिला। तब सुप्रीम कोर्ट के नियमों का लाभ पूरी मजबूती से दिखाई दिया था।लेकिन अब वही नियम नए साहब के मामले में शायद उतने प्रभावशाली नहीं दिख रहे। प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि प्रदेश में नियम किताबों से कम और परिस्थितियों से ज्यादा चलते हैं। यहां नियम भी मौसम की तरह बदलते हैं, कभी गर्मी वाले, कभी बरसात वाले।
कलेक्टर साहब का दिल
बस्तर के एक जिले के कलेक्टर साहब इन दिनों दिल्ली रवाना होने की तैयारी में हैं। वैसे हर आईएएस अधिकारी के लिए दिल्ली पोस्टिंग किसी बड़े प्रमोशन से कम नहीं मानी जाती। इसलिए खुशी स्वाभाविक है। लेकिन कहते हैं कि जहां ज्यादा समय बिताओ, वहां थोड़ा लगाव हो ही जाता है। अब जिले से बिछड़ने का दर्द भी साहब के चेहरे पर साफ दिखाई देने लगा है। सरकारी फाइलों और बैठकों के बीच भावनात्मक अटैचमेंट वाली स्थिति बन गई है। चर्चा है कि दिल्ली की तैयारी पूरी रफ्तार से चल रही है, लेकिन जिला छोड़ने की बात आते ही चेहरे पर हल्की उदासी उतर आती है। आखिर प्यार में बड़ी ताकत होती है, चाहे वो इंसान से हो या जिले से।
प्रोफेसर की रहस्यमयी बहाली
प्रदेश के एक विश्वविद्यालय में विवादित प्रोफेसर की बहाली ने पूरे कैंपस को कानाफूसी का केंद्र बना दिया है। पहले हाई कोर्ट के आदेश, जांच और विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्रवाई के बाद उन्हें बर्खास्त किया गया था। अब करीब दो साल बाद अचानक उनकी वापसी हो गई। अब सवाल यही उठ रहा है कि तब की कार्रवाई सही थी या अब की बहाली? दोनों बातें एक साथ सही तो नहीं हो सकतीं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि बहाली का कोई सार्वजनिक आदेश सामने नहीं आया, लेकिन प्रोफेसर साहब को ज्वाइनिंग जरूर मिल गई। कई लोगों को इसकी जानकारी नोटिस बोर्ड से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पोस्ट देखकर मिली।
विश्वविद्यालय में चर्चा है कि पिछले कई महीनों से बंद कमरों में बैठकों का दौर चल रहा था। किसी को भनक तक नहीं लगी। लेकिन जैसे ही अंतिम मुहर लगाने की बैठक हुई, खबर हवा से भी तेज बाहर निकल आई। अब प्रोफेसर साहब मिठाई बांट रहे हैं और कैंपस में यह चर्चा गर्म है कि संवैधानिक पद पर बैठे एक बड़े नेता के ओएसडी साहब का आशीर्वाद इस पूरी पटकथा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। मामला शिक्षा से ज्यादा सेटिंग विज्ञान का शोध विषय लगता है।

