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पौधरोपण में भ्रष्टाचार
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छत्तीसगढ़

बलरामपुर : धंधापुर में भ्रष्टाचार की रोपणी, 15 लाख स्वाहा और 90% पौधे मृत

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के धंधापुर गांव में उद्यान विभाग और मनरेगा के तहत हुए पौधरोपण कार्य पर भ्रष्टाचार और लापरवाही के गंभीर आरोप लगे हैं। करीब 15 लाख रुपये की लागत से लगाए गए 1125 फलदार पौधों में से लगभग 90% देखरेख, सिंचाई और उचित व्यवस्था के अभाव में सूख गए। ग्रामीणों का आरोप है कि काम केवल कागजों पर पूरा दिखाया गया, जबकि मौके पर न तो पर्याप्त खाद-कीटनाशक का उपयोग हुआ और न ही बोरवेल की मरम्मत कर सिंचाई की व्यवस्था की गई। फेंसिंग निर्माण में भी घटिया सामग्री और गुणवत्ता पर सवाल उठे हैं।

कीर्तिमान डेस्क
कीर्तिमान डेस्क
02 May 2026, 10:59 AM
राजपुर/बलरामपुर

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले से भ्रष्टाचार का एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां विकास के नाम पर सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है। राजपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत धंधापुर में उद्यान विभाग की लापरवाही और धांधली ने राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) के तहत किए गए पौधरोपण को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है।

कागजों में खाद, हकीकत में सूखा

करीब 6 महीने पहले उद्यान विभाग ने लाखों की लागत से कई हेक्टेयर में पौधरोपण का कार्य कराया था। नियम के अनुसार, पौधों की रोपाई के समय विशिष्ट खाद और कीटनाशकों का प्रयोग अनिवार्य था, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभाग ने सिर्फ गड्ढे खोदकर औपचारिकता पूरी की। आज स्थिति यह है कि देखरेख के अभाव में 90% पौधे दम तोड़ चुके हैं।

हैरानी की बात यह है कि इस परियोजना स्थल पर बोरवेल की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन विभाग ने उसकी मरम्मत कराना जरूरी नहीं समझा। नतीजा यह हुआ कि भीषण गर्मी और सिंचाई के अभाव में 1125 फलदार पौधे झुलस गए। जो पौधे बचे हैं, उन्हें दीमक चाट रहे हैं।

एक ही जमीन, बार-बार भ्रष्टाचार

धंधापुर की यह जमीन अब पौधरोपण के लिए नहीं, बल्कि 'भ्रष्टाचार की उपजाऊ भूमि' नजर आ रही है। रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले दो दशकों में यहाँ तीन बार बड़े पैमाने पर निवेश किया गया:

  1. 2005: रतनजोत के पौधे लगाए गए (विफल)।

  2. 2011: रेशम बोर्ड द्वारा अर्जुन के पौधे लगाए गए (विफल)।

  3. 2025: 15 लाख की लागत से फलदार पौधे लगाए गए (90% मृत)।

सवाल यह उठता है कि जब पिछले दो प्रयासों में यहाँ पौधे जीवित नहीं बच पाए, तो बिना किसी ठोस कार्ययोजना के तीसरी बार उसी जमीन पर लाखों रुपये क्यों फूंके गए?

घटिया निर्माण और कमीशनखोरी का खेल

पौधों की सुरक्षा के लिए DMF (जिला खनिज संस्थान न्यास) मद से फेंसिंग कराई गई थी, लेकिन यहाँ भी जमकर धांधली हुई। सीमेंट के पोल की गुणवत्ता इतनी खराब है कि वे अभी से टूटने लगे हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि मानक मापदंडों को ताक पर रखकर घटिया सामग्री का उपयोग किया गया। इसके बावजूद, विभागीय इंजीनियरों ने कार्य का मूल्यांकन कर भुगतान पारित कर दिया, जो सीधे तौर पर मिलीभगत की ओर इशारा करता है।

"अधिकारियों को समय रहते गड़बड़ी की सूचना दी गई थी, लेकिन शिकायतों को अनसुना कर दिया गया। आज 15 लाख रुपये मिट्टी में मिल चुके हैं।" — स्थानीय निवासी

हरियाली का दावा

धंधापुर का यह मामला केवल पौधों के मरने का नहीं, बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई के बंदरबांट का है। जहाँ एक ओर सरकार हरियाली बढ़ाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर धंधापुर जैसे उदाहरण व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई करता है या फिर यह फाइल भी पुराने पौधों की तरह दफन हो जाएगी।

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