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पं. युवराज पांडेय की कथा
पं. युवराज पांडेय की कथा
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भक्ति में डूबा देवभोग : पं. युवराज पांडेय के भजनों पर झूमे श्रद्धालु, भागवत कथा की पूर्णाहूति

गरियाबंद जिले के देवभोग स्थित सरस्वती शिशु मंदिर मैदान में आयोजित सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञानयज्ञ का 17 मई को पूर्णाहूति और महाप्रसाद वितरण के साथ समापन हुआ। राष्ट्रीय कथा वाचक पंडित युवराज पांडेय ने भक्त प्रह्लाद और श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के प्रसंगों के माध्यम से शिक्षा, भक्ति और मोह-माया से मुक्ति का संदेश दिया। आयोजन में कृष्ण जन्म, रुक्मणी विवाह और माखन चोरी की जीवंत झांकियां आकर्षण का केंद्र रहीं। ओड़िया भजन और छत्तीसगढ़ी पचरा गीतों पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूमते नजर आए।

प्रकाशित: 18 May 2026, 12:53 PM · अपडेट: 12 Sep 2026, 11:14 AM
गरियाबंद
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

देवभोग स्थित सरस्वती शिशु मंदिर मैदान में चल रहे सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञानयज्ञ का रविवार, 17 मई को भव्य पूर्णाहूति और महाप्रसाद वितरण के साथ विधि-विधान से समापन हो गया। कपिल ठाकुर परिवार द्वारा आयोजित इस भव्य धार्मिक अनुष्ठान में देश के सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय कथा वाचक पंडित युवराज पांडेय के मुखारविंद से कथा सुनने के लिए गरियाबंद सहित आसपास के इलाकों से रोजाना हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता रहा। 11 मई से शुरू हुए इस आयोजन ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय कर दिया।

कथा के दौरान पंडित युवराज पांडेय ने अपनी ओजस्वी वाणी से भक्तों को जीवन का सार समझाया। भक्त प्रह्लाद के प्रसंग का जीवंत वर्णन करते हुए उन्होंने शिक्षा के महत्व पर विशेष जोर दिया।

पं. युवराज पांडेय ने कहा: "असुर पुत्र होने के बावजूद प्रह्लाद ने जो श्रेष्ठ ज्ञान अर्जित किया, उसी का परिणाम था कि स्वयं भगवान को उनके लिए अवतार लेना पड़ा। शिक्षा हर क्षेत्र में अनिवार्य है। शिक्षा उस शेरनी के दूध के समान है, जिसे ग्रहण करने वाला हर क्षेत्र में दहाड़ता है और सफल होता है। लेकिन याद रखें, किसी भी क्षेत्र का पूर्ण ज्ञान होना जरूरी है, क्योंकि अधूरा ज्ञान हमेशा विष के समान घातक होता है।"

मोह-माया और ब्रह्म का भेद

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के गूढ़ रहस्य को समझाते हुए कथावाचक ने कहा कि जैसे ही वासुदेव जी ने साक्षात ब्रह्म (बालकृष्ण) को अपने सिर पर उठाया, उनके हाथों की बेड़ियां स्वतः ही खुल गईं। इसके विपरीत, जैसे ही उन्होंने माया (महामाया) को छुआ, वे पुनः बंधनों में जकड़ गए। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने संदेश दिया कि सांसारिक मोह-माया ही मनुष्य के दुख और विनाश का मूल कारण है, जबकि भक्ति मार्ग पर चलकर ब्रह्म को धारण करने वाले सदैव परम सुख प्राप्त करते हैं।

आकर्षण का केंद्र बनीं जीवंत झांकियां

इस सात दिवसीय आयोजन में केवल कथा ही नहीं, बल्कि विभिन्न धार्मिक प्रसंगों पर आधारित सजीव झांकियां मुख्य आकर्षण का केंद्र रहीं।

  • श्रीकृष्ण जन्म व नंदोत्सव

  • माखन चोरी और दही लूट

  • रुक्मणी विवाह प्रसंग

इन सभी अवसरों पर कलाकारों द्वारा दी गई जीवंत प्रस्तुतियों को देखकर पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। विशेषकर रुक्मणी विवाह और कृष्ण जन्म के दौरान पूरा पंडाल करतल ध्वनि और "जय कन्हैया लाल की" के जयकारों से गुंजायमान रहा।

ओड़िया भजनों और 'पचरा' पर थिरकीं महिला श्रद्धालु

पंडित युवराज पांडेय न केवल एक कुशल कथा प्रवक्ता हैं, बल्कि संगीत कला में भी पारंगत हैं। छत्तीसगढ़ी संस्कृति के पारंपरिक 'पचरा' गीतों की पंडाल में हर दिन विशेष मांग रही। इसके अलावा, पड़ोसी राज्य की संस्कृति को समेटे हुए ओड़िया भजन, कीर्तन और भगवान जगन्नाथ के भजनों की ऐसी तान उन्होंने छेड़ी कि श्रद्धालु खुद को झूमने से नहीं रोक पाए। अपने चिर-परिचित और सुरीले अंदाज से उन्होंने पंडाल में मौजूद महिला श्रद्धालुओं को भी भक्ति में लीन होकर थिरकने पर मजबूर कर दिया।

यज्ञशाला की परिक्रमा और विदाई की अश्रुधारा

17 मई को कथा के अंतिम दिन हवन-पूजन, पूर्णाहुति और भंडारे का आयोजन किया गया। ठाकुर परिवार सहित क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों ने व्यासपीठ का पूजन कर आचार्य श्री से आशीर्वाद लिया। समापन के अवसर पर श्रद्धालुओं की आंखें भी नम दिखीं। देवभोग के इतिहास में इस भव्य आयोजन को इसके अद्वितीय प्रबंधन, अगाध जनसमूह और संगीतमय प्रस्तुतियों के लिए लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

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