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देश में अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज
देश में अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज
सेहत

वायु प्रदूषण : बना साइलेंट किलर, बच्चों के फेफड़ों पर सबसे ज्यादा असर

देश में बढ़ते वायु प्रदूषण और PM2.5 के ऊंचे स्तर के कारण अस्थमा (Asthma) और COPD जैसी फेफड़ों की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। अब सिर्फ धूम्रपान करने वाले ही नहीं, बल्कि बच्चे और नॉन-स्मोकर्स भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार जहरीले प्रदूषण कण फेफड़ों में गहराई तक पहुंचकर सांस संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा कर रहे हैं। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन सकता है।

कीर्तिमान नेटवर्क
14 May 2026, 02:02 PM
📍 रायपुर
देश में अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी COPD के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पहले जहां इन बीमारियों को मुख्य रूप से धूम्रपान करने वालों या बुजुर्गों की समस्या माना जाता था, वहीं अब स्थिति तेजी से बदल रही है। डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते वायु प्रदूषण, खासकर PM2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक कणों ने बच्चों, युवाओं और धूम्रपान न करने वाले लोगों के फेफड़ों को भी गंभीर खतरे में डाल दिया है विशेषज्ञों के अनुसार भारत के कई बड़े शहरों में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, नोएडा और नागपुर जैसे शहरों में PM2.5 और जहरीली गैसों का स्तर लंबे समय तक सुरक्षित सीमा से ऊपर बना रहता है। इसका असर अब सीधे लोगों की सांस और फेफड़ों पर दिखाई देने लगा है।

PM2.5 क्यों है इतना खतरनाक

PM2.5 बेहद सूक्ष्म प्रदूषण कण होते हैं, जिनका आकार मानव बाल से लगभग 30 गुना छोटा होता है। ये इतने छोटे होते हैं कि सांस के जरिए सीधे फेफड़ों के भीतर पहुंच जाते हैं और कई मामलों में रक्त प्रवाह तक में प्रवेश कर जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार PM2.5 लंबे समय तक शरीर में रहने पर फेफड़ों, हृदय, मस्तिष्क और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है।  स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि ये कण शरीर में सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और इम्यून सिस्टम की कमजोरी पैदा करते हैं। यही कारण है कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने वाले लोगों में अस्थमा, COPD, फेफड़ों का कैंसर और सांस संबंधी अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। 

स्मोकर्स की बीमारी नहीं रहा COPD

एक समय COPD को “स्मोकर्स डिजीज” माना जाता था, लेकिन अब डॉक्टरों का कहना है कि बड़ी संख्या में नॉन-स्मोकर्स भी इस बीमारी का शिकार हो रहे हैं। नोएडा और दिल्ली NCR के डॉक्टरों ने हाल के वर्षों में ऐसे मरीजों की संख्या में तेज वृद्धि दर्ज की है, जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया, लेकिन लगातार प्रदूषित हवा में रहने के कारण उनके फेफड़े प्रभावित हुए। विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक PM2.5, धूल, जहरीली गैसों, वाहन धुएं और औद्योगिक प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। कई मरीजों में शुरुआती लक्षण सामान्य खांसी या सांस फूलने जैसे होते हैं, इसलिए बीमारी देर से पकड़ में आती है। डॉक्टरों का कहना है कि निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, डीजल धुआं, बायोमास जलाना और खराब वेंटिलेशन जैसी समस्याएं भी COPD और अस्थमा के बड़े कारण बन चुकी हैं। 

बच्चों के फेफड़ों पर सबसे ज्यादा असर

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों पर वायु प्रदूषण का असर सबसे ज्यादा पड़ रहा है। बच्चों के फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते, इसलिए प्रदूषण उनके श्वसन तंत्र को जल्दी प्रभावित करता है। रिसर्च में पाया गया है कि PM2.5 के लगभग 40 प्रतिशत कण बच्चों के फेफड़ों के भीतर गहराई तक पहुंच जाते हैं।  दक्षिण भारत के स्कूली बच्चों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि जिन क्षेत्रों में AQI ज्यादा खराब था, वहां बच्चों की फेफड़ों की क्षमता कम पाई गई। कई बच्चों में सांस फूलना, बार-बार खांसी, व्हीजिंग और अस्थमा के लक्षण तेजी से बढ़े। डॉक्टरों का कहना है कि लगातार प्रदूषित हवा में रहने से बच्चों के फेफड़ों का विकास भी प्रभावित हो सकता है। इससे भविष्य में गंभीर श्वसन रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
WHO ने दी गंभीर चेतावनी
विश्व स्वास्थ्य संगठन लगातार चेतावनी दे रहा है कि वायु प्रदूषण दुनिया में मौत और बीमारियों के सबसे बड़े कारणों में शामिल हो चुका है। WHO के अनुसार PM2.5 का स्तर जितना ज्यादा होगा, उतना ही फेफड़ों और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ेगा। WHO ने PM2.5 के लिए बेहद कम सुरक्षित सीमा तय की है, लेकिन भारत सहित दक्षिण एशिया के कई देशों में यह स्तर लगातार उससे कई गुना ऊपर बना रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक प्रदूषण में रहने से जीवन प्रत्याशा भी कम हो सकती है।

 घर के भीतर की हवा भी बन रही खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार सिर्फ बाहरी प्रदूषण ही नहीं, बल्कि घर के भीतर का प्रदूषण भी खतरनाक होता जा रहा है। रसोई में लकड़ी या कोयले का इस्तेमाल, मच्छर भगाने वाली कॉइल, अगरबत्ती, धूम्रपान और खराब वेंटिलेशन जैसी चीजें भी फेफड़ों को नुकसान पहुंचा रही हैं। गांवों और छोटे शहरों में बायोमास ईंधन का इस्तेमाल महिलाओं और बच्चों में श्वसन रोगों का बड़ा कारण माना जा रहा है।

डॉक्टरों ने बताए शुरुआती संकेत

पल्मोनोलॉजिस्ट्स के अनुसार लगातार खांसी, सीने में जकड़न, सांस फूलना, सीढ़ियां चढ़ने में परेशानी, बार-बार संक्रमण और व्हीजिंग जैसी समस्याओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई लोग इन्हें सामान्य मौसमी समस्या मानकर इलाज नहीं कराते, जिससे बीमारी गंभीर रूप ले लेती है।  विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते फेफड़ों की जांच और स्पाइरोमेट्री टेस्ट कराने से बीमारी का पता शुरुआती चरण में लगाया जा सकता है।

समाधान

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ दवाओं से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए प्रदूषण नियंत्रण सबसे जरूरी है।
विशेषज्ञों ने कुछ अहम सुझाव दिए हैं
  1. खराब AQI वाले दिनों में बाहर कम निकलें
  2.  N95 मास्क का इस्तेमाल करें
  3.  घरों में एयर प्यूरीफायर और बेहतर वेंटिलेशन रखें
  4.  बच्चों को खुले में खेलने के लिए कम प्रदूषित समय चुनें
  5.  धूम्रपान और सेकेंड हैंड स्मोक से बचें
  6.  नियमित फेफड़ों की जांच कराएं
  7.  पेड़ लगाना और वाहन प्रदूषण कम करना जरूरी है

 बढ़ती बीमारी बन रही सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वायु प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में अस्थमा और COPD देश के सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों में शामिल हो सकते हैं। बच्चों और नॉन-स्मोकर्स में बढ़ते मामलों ने यह साफ कर दिया है कि प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा खतरा बन चुका है।

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