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वट सावित्री व्रत पर पूजा करती महिलाएं।
वट सावित्री व्रत पर पूजा करती महिलाएं।
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अखंड सौभाग्य की कामना : महासमुंद में श्रद्धा और उत्साह से मनाया गया वट सावित्री व्रत

महासमुंद में वट सावित्री व्रत, शनि अमावस्या और शनि जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई। महिलाओं ने वट वृक्ष की पूजा कर अखंड सौभाग्य की कामना की, वहीं श्रद्धालुओं ने शनिदेव की विशेष पूजा-अर्चना की।

कीर्तिमान ब्यूरो
प्रकाशित: 16 May 2026, 05:11 PM · अपडेट: 11 Sep 2026, 11:54 PM
महासमुंद
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

जिलेभर में शनिवार को वट सावित्री व्रत, शनि अमावस्या और शनि जयंती का दुर्लभ संयोग श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। सुहागिन महिलाओं ने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए वट वृक्ष की पूजा-अर्चना की, वहीं श्रद्धालुओं ने शनिदेव की विशेष पूजा कर जीवन की बाधाओं और कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना की। धार्मिक संयोग के कारण शहर के मंदिरों, शनि देवालयों और सार्वजनिक स्थलों पर सुबह से भक्तों की भारी भीड़ रही।

महासमुंद शहर सहित आसपास के क्षेत्रों में सुबह से ही महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा और सोलह श्रृंगार में सजकर वट वृक्षों के पास पहुंचीं। पूजा की थालियों में फल, फूल, रोली, अक्षत, दीपक और मिठाई सजाकर महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा संपन्न की। महिलाओं ने वट वृक्ष के चारों ओर धागा बांधते हुए सात परिक्रमा की और परिवार की खुशहाली की कामना की।

पूजन के दौरान सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण कराया गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां सावित्री ने अपने तप, निष्ठा और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। इसी कारण यह व्रत पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन का प्रतीक माना जाता है।

कई स्थानों पर महिलाओं ने सामूहिक भजन-कीर्तन भी किया, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। मंदिर परिसरों में “सदा सुहागन रहो” और “अखंड सौभाग्य” की मंगलकामनाओं के साथ महिलाओं ने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं।

शनि अमावस्या और शनि जयंती का बना विशेष संयोग

इस वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या शनिवार को पड़ने से शनि अमावस्या और शनि जयंती का विशेष संयोग बना। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी तिथि पर शनिदेव का प्राकट्य हुआ था। इसके चलते शनिदेव के मंदिरों में सुबह से श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। भक्तों ने शनिदेव को तेल अर्पित किया, काला तिल, उड़द और सरसों का तेल चढ़ाकर पूजा-अर्चना की। कई श्रद्धालुओं ने पीपल वृक्ष के नीचे दीपदान कर शनि दोष से मुक्ति और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनि अमावस्या पर विशेष स्थानों पर आटे का दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और शनिदेव की कृपा बनी रहती है।

इन स्थानों पर दीपदान का विशेष महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार शनि अमावस्या की शाम पीपल वृक्ष, शनि मंदिर, नदी या तालाब के किनारे, घर के मुख्य द्वार और किसी चौराहे पर दीपक जलाना शुभ माना जाता है। श्रद्धालुओं ने इन स्थानों पर दीपदान कर परिवार की खुशहाली और करियर में सफलता की प्रार्थना की।

बाजारों में भी दिखी पर्व की रौनक

वट सावित्री व्रत और शनि अमावस्या को लेकर महासमुंद शहर के बाजारों में भी विशेष रौनक रही। पूजा सामग्री, श्रृंगार सामान, फल-फूल, दीपक और साड़ियों की दुकानों पर महिलाओं और श्रद्धालुओं की भीड़ नजर आई। स्थानीय व्यापारियों के अनुसार पर्व के चलते सुबह से देर शाम तक बाजारों में अच्छी खरीदी हुई।

नई पीढ़ी भी निभा रही परंपरा

इस बार बड़ी संख्या में युवा महिलाएं और नवविवाहिताएं भी वट सावित्री व्रत में शामिल होती नजर आईं। महिलाओं ने कहा कि यह पर्व केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और वैवाहिक परंपराओं का प्रतीक है। आधुनिक जीवनशैली के बावजूद नई पीढ़ी में इन परंपराओं के प्रति उत्साह और श्रद्धा बनी हुई है।

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