भारत के सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी का पाकिस्तान को लेकर दिया गया बयान केवल एक सैन्य प्रतिक्रिया नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे दक्षिण एशिया के इतिहास, आतंकवाद और दशकों पुराने भारत-पाक संघर्ष के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सेना संवाद कार्यक्रम के दौरान जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि पाकिस्तान को अब तय करना होगा कि उसे “भूगोल में रहना है या इतिहास बनना है।” उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा तनाव, आतंकवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता को लेकर चिंताएं लगातार बनी हुई हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सेना प्रमुख की यह टिप्पणी केवल वर्तमान हालात पर प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि पाकिस्तान को उसके अतीत की याद दिलाने और भविष्य को लेकर चेतावनी देने का प्रयास भी है। भारत और पाकिस्तान का संबंध 1947 के विभाजन के बाद से ही संघर्ष, युद्ध, अविश्वास और आतंकवाद से प्रभावित रहा है। दोनों देशों के बीच कई युद्ध हो चुके हैं, हजारों लोग मारे गए और दक्षिण एशिया की राजनीति लगातार अस्थिर बनी रही। ऐसे में सेना प्रमुख का बयान इतिहास और वर्तमान दोनों को जोड़ता नजर आता है।
विभाजन के साथ शुरू हुआ विवाद
1947 में भारत के विभाजन के साथ ही भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की शुरुआत हो गई थी। विभाजन के दौरान हुए सांप्रदायिक दंगों में लाखों लोगों की जान गई और करोड़ों लोग विस्थापित हुए। इसके तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर को लेकर दोनों देशों के बीच पहला युद्ध शुरू हो गया। पाकिस्तान समर्थित कबायली लड़ाकों ने कश्मीर में घुसपैठ की, जिसके बाद तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय हुआ। भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कई क्षेत्रों को मुक्त कराया। हालांकि युद्धविराम के बाद कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, जिसे आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) कहा जाता है। यहीं से कश्मीर भारत-पाक रिश्तों का सबसे बड़ा विवाद बन गया, जो आज तक जारी है।1965 का युद्ध और असफल रणनीति
1965 में पाकिस्तान ने “ऑपरेशन जिब्राल्टर” के तहत कश्मीर में घुसपैठ कर वहां विद्रोह भड़काने की कोशिश की। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि कश्मीर के लोग उसका समर्थन करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अंतरराष्ट्रीय सीमा तक सैन्य अभियान शुरू कर दिया। दोनों देशों के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें भारी नुकसान हुआ। अंततः सोवियत संघ की मध्यस्थता में ताशकंद समझौता हुआ और युद्ध समाप्त हुआ। लेकिन इस युद्ध ने यह साफ कर दिया कि कश्मीर के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बना रहेगा।
1971 जब इतिहास बदल गया
भारत-पाकिस्तान संबंधों के इतिहास में 1971 का युद्ध सबसे निर्णायक माना जाता है। पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक संकट और मानवाधिकार उल्लंघन के बीच लाखों शरणार्थी भारत पहुंचे। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हुआ। भारतीय सेना ने बेहद तेज और निर्णायक कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान को बड़ी हार दी। केवल 13 दिनों में पाकिस्तान की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया और लगभग 93 हजार पाकिस्तानी सैनिक युद्धबंदी बने। इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना। विश्लेषकों का मानना है कि सेना प्रमुख का “इतिहास बनने” वाला बयान कई मायनों में 1971 के युद्ध की ओर संकेत करता है, जब पाकिस्तान का भूगोल ही बदल गया था। यह युद्ध पाकिस्तान के इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य और राजनीतिक हार माना जाता है।
सियाचिन से कारगिल तक जारी रहा तनाव
1971 के बाद भी दोनों देशों के बीच तनाव कम नहीं हुआ। 1984 में भारत ने सियाचिन ग्लेशियर पर सैन्य नियंत्रण स्थापित किया। दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में दोनों देशों की सेनाएं आज भी तैनात हैं। इसके बाद 1999 में कारगिल युद्ध हुआ, जब पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों ने भारतीय सीमा में घुसकर ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा करने की कोशिश की। भारतीय सेना ने “ऑपरेशन विजय” चलाकर उन्हें खदेड़ दिया। कारगिल युद्ध ने भारत की सैन्य नीति में बड़ा बदलाव किया। इसके बाद भारत ने सीमा सुरक्षा, खुफिया तंत्र और आधुनिक हथियारों पर अधिक ध्यान देना शुरू किया।
आतंकवाद बना सबसे बड़ा मुद्दा
पिछले दो दशकों में आतंकवाद भारत-पाक संबंधों का सबसे बड़ा विवाद बनकर सामने आया। भारत लगातार पाकिस्तान पर आतंकवादी संगठनों को समर्थन देने का आरोप लगाता रहा है। 2001 में भारतीय संसद पर हमला, 2008 का मुंबई आतंकी हमला, पठानकोट हमला, उरी हमला और पुलवामा हमला जैसी घटनाओं ने दोनों देशों के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया। उरी हमले के बाद भारत ने 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक की, जबकि 2019 में पुलवामा हमले के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक कर आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया। इन कार्रवाइयों ने यह संकेत दिया कि भारत अब आतंकवाद के खिलाफ अधिक आक्रामक रणनीति अपना चुका है।“दुश्मन को उसी भाषा में जवाब”
सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अपने बयान में साफ कहा कि भारतीय सेना हर चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो जवाब उसी भाषा में दिया जाएगा जिसे दुश्मन समझता हो। उनका यह बयान भारत की बदली हुई सैन्य सोच को दर्शाता है। अब भारत केवल सीमा रक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि किसी भी खतरे का निर्णायक जवाब देने की क्षमता दिखाना चाहता है। उन्होंने सीमा पर तैनात जवानों की तैयारी, आधुनिक हथियारों और नई तकनीकों का भी उल्लेख किया। सेना प्रमुख के अनुसार भारतीय सेना हर परिस्थिति में देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।चीन-पाकिस्तान गठजोड़ से बढ़ी चिंता
हाल के वर्षों में चाइना और पाकिस्तान के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी भी भारत के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC), रक्षा सहयोग और सैन्य तकनीक के आदान-प्रदान को भारत बेहद गंभीरता से देख रहा है। हाल ही में विदेश मंत्रालय ने भी कहा था कि आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों को यह समझना चाहिए कि ऐसे कदम उनकी वैश्विक प्रतिष्ठा को प्रभावित करते हैं। इसे चीन द्वारा पाकिस्तान को दिए जा रहे समर्थन के संदर्भ में देखा गया।
बदली हुई वैश्विक राजनीति में भारत का संदेश
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जनरल द्विवेदी का बयान केवल पाकिस्तान के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक संदेश है। भारत यह स्पष्ट करना चाहता है कि वह अब आतंकवाद और सीमा पार हिंसा को लेकर किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरतेगा। आज भारत वैश्विक मंच पर पहले से कहीं अधिक मजबूत स्थिति में है। रक्षा क्षमता, कूटनीति और आर्थिक शक्ति के कारण भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में भारत यह भी दिखाना चाहता है कि वह अपनी सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर स्तर पर तैयार है।

