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फीफा विश्व कप के विवादों ने कैसे बदल दिए फुटबॉल के नियम
फीफा विश्व कप के विवादों ने कैसे बदल दिए फुटबॉल के नियम
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फीफा विश्व कप :  विवाद बने नियम बदलाव की बड़ी वजह

फीफा विश्व कप के इतिहास में कई बड़े विवाद हुए, जिन्होंने फुटबॉल के नियमों को बदलने पर मजबूर कर दिया। 1962 के हिंसक चिली-इटली मैच के बाद पीले और लाल कार्ड शुरू किए गए। 1990 विश्व कप के बाद बैक-पास नियम बदला गया, जबकि 2010 में गलत गोल फैसले के बाद गोल-लाइन टेक्नोलॉजी लागू हुई। 2018 में VAR और 2022 में सेमी-ऑटोमेटेड ऑफसाइड टेक्नोलॉजी आई। अब 2026 फीफा विश्व कप 48 टीमों और नए फॉर्मेट के साथ खेला जाएगा।

कीर्तिमान नेटवर्क
14 May 2026, 05:32 PM
नई दिल्ली
फीफा विश्व कप सिर्फ फुटबॉल का सबसे बड़ा मंच नहीं, बल्कि इस खेल के इतिहास में बदलावों का बड़ा कारण भी रहा है। 1930 में शुरू हुए विश्व कप ने करीब 96 साल के सफर में कई यादगार मुकाबले देखे हैं, लेकिन इसी दौरान कई ऐसे विवाद भी हुए, जिनके बाद फुटबॉल के नियम, तकनीक और टूर्नामेंट का ढांचा बदलना पड़ा। फीफा विश्व कप 2026 की शुरुआत 11 जून से होगी। इस बार टूर्नामेंट अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा की संयुक्त मेजबानी में खेला जाएगा। यह अब तक का सबसे बड़ा विश्व कप होगा, जिसमें 48 टीमें और 104 मुकाबले होंगे।

1962 का ‘बैटल ऑफ सैंटियागो’ और कार्ड सिस्टम की शुरुआत

फुटबॉल इतिहास के सबसे चर्चित विवादों में 1962 फीफा विश्व कप का चिली बनाम इटली मुकाबला शामिल है। 2 जून 1962 को खेले गए इस मैच में दोनों टीमों के खिलाड़ियों के बीच जमकर झड़प हुई। मैच के दौरान मुक्के चले, खिलाड़ी भिड़े और पुलिस को कई बार मैदान में दखल देना पड़ा। इस मैच को बाद में “Battle of Santiago” कहा गया।  उस समय रेफरी खिलाड़ियों को चेतावनी देने या बाहर भेजने के लिए आज की तरह पीला और लाल कार्ड नहीं दिखाते थे। भाषा की समस्या भी बड़ी थी, क्योंकि अलग-अलग देशों के खिलाड़ी रेफरी की बात कई बार समझ नहीं पाते थे। इसी समस्या को देखते हुए रेफरी केन एस्टन ने बाद में ट्रैफिक लाइट से प्रेरित होकर पीले और लाल कार्ड का विचार दिया। पीला कार्ड चेतावनी और लाल कार्ड मैदान से बाहर करने का संकेत बना। यह फुटबॉल में अनुशासन बनाए रखने का सबसे बड़ा बदलाव माना जाता है।

1990 विश्व कप की धीमी फुटबॉल और बैक-पास नियम 

1990 के विश्व कप में कई टीमों ने समय बर्बाद करने के लिए बार-बार गेंद अपने गोलकीपर को पास की। उस समय गोलकीपर अपने साथी खिलाड़ी के पैर से आए पास को हाथ से पकड़ सकता था। इससे खेल की गति धीमी हो जाती थी और दर्शकों को मुकाबले कम रोमांचक लगते थे। इसी कारण 1992 में बैक-पास नियम लागू किया गया। इस नियम के बाद यदि कोई खिलाड़ी जानबूझकर अपने पैर से गेंद गोलकीपर को पास करता है, तो गोलकीपर उसे हाथ से नहीं पकड़ सकता। ऐसा करने पर विरोधी टीम को अप्रत्यक्ष फ्री-किक मिलती है। इस बदलाव का मकसद खेल को तेज, आक्रामक और दर्शकों के लिए रोमांचक बनाना था।

2010 का लैम्पार्ड ‘घोस्ट गोल’ और गोल-लाइन टेक्नोलॉजी

2010 विश्व कप में इंग्लैंड और जर्मनी के बीच खेले गए मैच में फ्रैंक लैम्पार्ड का शॉट क्रॉसबार से टकराकर गोल लाइन के अंदर गिरा, लेकिन रेफरी ने गोल नहीं दिया। टीवी रिप्ले में साफ दिखा कि गेंद लाइन पार कर चुकी थी। यह विश्व कप के सबसे बड़े रेफरी विवादों में शामिल हो गया।इसके बाद फुटबॉल में गोल-लाइन टेक्नोलॉजी की मांग तेज हो गई। इस तकनीक का मकसद यह पता लगाना है कि गेंद पूरी तरह गोल लाइन पार कर चुकी है या नहीं। 2014 ब्राजील विश्व कप में पहली बार गोल-लाइन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया। 

VAR ने बदला रेफरी फैसलों का तरीका

फुटबॉल में कई बार पेनल्टी, ऑफसाइड, रेड कार्ड या गोल से जुड़े फैसले विवाद का कारण बनते रहे हैं। इन्हीं गलतियों को कम करने के लिए वीडियो असिस्टेंट रेफरी यानी VAR को विश्व कप में लागू किया गया। 2018 रूस विश्व कप में पहली बार VAR का पूर्ण रूप से इस्तेमाल किया गया। FIFA के अनुसार VAR का उद्देश्य साफ और बड़ी गलतियों को सुधारना था। VAR टीम वीडियो रिप्ले देखकर रेफरी को मदद देती है। इसका इस्तेमाल गोल, पेनल्टी, सीधे रेड कार्ड और गलत खिलाड़ी को सजा देने जैसी स्थितियों में किया जाता है।

2022 में सेमी-ऑटोमेटेड ऑफसाइड टेक्नोलॉजी

ऑफसाइड फैसले भी लंबे समय से विवादों का कारण रहे हैं। कई बार एक पैर, कंधे या बहुत छोटे अंतर से ऑफसाइड तय होता है, जिससे खिलाड़ी और फैंस नाराज होते हैं। इसे ज्यादा सटीक बनाने के लिए 2022 कतर विश्व कप में सेमी-ऑटोमेटेड ऑफसाइड टेक्नोलॉजी लागू की गई। FIFA के अनुसार इस तकनीक में स्टेडियम की छत के नीचे लगे 12 कैमरे गेंद और खिलाड़ियों के शरीर के 29 डेटा पॉइंट्स को ट्रैक करते हैं। इससे ऑफसाइड फैसले तेज और ज्यादा सटीक हो जाते हैं। 

2026 विश्व कप में सबसे बड़ा ढांचा बदलाव

2026 विश्व कप में बड़ा बदलाव टूर्नामेंट के आकार में होगा। पहली बार 32 की जगह 48 टीमें खेलेंगी। मुकाबलों की संख्या 64 से बढ़कर 104 हो जाएगी। FIFA के अनुसार यह टूर्नामेंट 11 जून से 19 जुलाई 2026 तक अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा में खेला जाएगा।  इस बदलाव का उद्देश्य ज्यादा देशों को विश्व कप में मौका देना है। इससे एशिया, अफ्रीका और छोटे फुटबॉल देशों की भागीदारी बढ़ेगी। हालांकि आलोचकों का कहना है कि इससे टूर्नामेंट लंबा होगा और खिलाड़ियों पर दबाव बढ़ेगा।

अनुशासन नियमों में भी बदलाव

2026 विश्व कप से पहले FIFA ने अनुशासन नियमों में भी बदलाव किया है। नई व्यवस्था के तहत क्वालिफायर में मिले कुछ छोटे निलंबन अब सीधे विश्व कप फाइनल टूर्नामेंट में लागू नहीं होंगे। इसका असर अर्जेंटीना के निकोलस ओटामेंडी और इक्वाडोर के मोइसेस कैइसेडो जैसे खिलाड़ियों पर पड़ा, जिन्हें शुरुआती मैच खेलने की अनुमति मिल गई। हालांकि गंभीर रेड कार्ड मामलों में सजा लागू रहेगी। 

कई  बार बड़े बदलाव हुए

फुटबॉल के नियम समय-समय पर IFAB बदलता है, जबकि FIFA विश्व कप में इन्हें लागू करता है। विश्व कप विवादों और जरूरतों से जुड़े बड़े बदलावों को देखें तो कम से कम 6 बड़े बदलाव बेहद अहम माने जाते हैं। पहला, पीले और लाल कार्ड का सिस्टम। दूसरा, बैक-पास नियम। तीसरा, गोल-लाइन टेक्नोलॉजी। चौथा, VAR। पांचवां, सेमी-ऑटोमेटेड ऑफसाइड टेक्नोलॉजी। छठा, 2026 विश्व कप का 48 टीमों वाला नया प्रारूप। इनके अलावा सब्स्टीट्यूशन, अतिरिक्त समय, कूलिंग ब्रेक, कन्कशन प्रोटोकॉल और अनुशासन नियमों में भी कई बदलाव समय-समय पर हुए हैं।
फीफा विश्व कप के विवादों ने फुटबॉल को कमजोर नहीं किया, बल्कि उसे ज्यादा आधुनिक, तेज और पारदर्शी बनाया। 1962 के हिंसक मैच से कार्ड सिस्टम आया, 1990 की धीमी फुटबॉल से बैक-पास नियम बदला, 2010 के गलत गोल फैसले से गोल-लाइन टेक्नोलॉजी आई और 2018 के बाद VAR ने रेफरी फैसलों को नया आधार दिया। अब 2026 विश्व कप 48 टीमों और नए फॉर्मेट के साथ फुटबॉल इतिहास का सबसे बड़ा टूर्नामेंट बनने जा रहा है। इससे साफ है कि फुटबॉल लगातार बदल रहा है, और हर बड़ा विवाद इस खेल को सुधारने का नया मौका भी देता है।
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