महासमुंद जिला मुख्यालय से 10 किमी दूर स्थित बिरकोनी की पावनधरा पर आदिशक्ति स्वरूपा मां चण्डी का मंदिर लाखों लोगों की आस्था का केन्द्र है। यहां सच्चे मन से मांगी गई हर कामना पूरी होती है। यहां की मां चण्डी अद्वितीय सुंदरी हैं। काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित इतनी चण्डी की प्रतिमा अत्यंतदुर्लभ है। कहते हैं नवरात्र में हर रात मां के चेहरे का भाव परिवर्तन होता रहता है। कभी प्रचण्ड तेजस्विनी दिखती हैं, तो कभी सौम्य ममतामयी, परन्तु हर रूप में वह मनोहारिणी हैं। मां चण्डी की कीर्ति मनोकामना पूर्ण करने वाली देवी के रूप में है।वर्ष 2002 में शासन के निर्देश पर इस मातृशक्ति स्थल के संबंध में शिक्षक पोखन दास मानिकपुरी द्वारा यहां के बुजुर्गों और जानकारों से चर्चा कर प्राप्त तथ्यों और जानकारी के आधार पर आलेख तैयार किया गया था। इसका इतिहास पौराणिक काल से शुरू होता है, जब श्रीपुर यानी वर्तमान सिरपुर बाणासुर की राजधानी थी। उसकी सैनिक छावनी बिरकोनी के पास थी। उनके सैनिकों ने ही रणचण्डी की प्रतिमा यहां एक टीले पर स्थापित की थी। युद्ध पर जाने से पूर्व वे विजय की कामना करते हुए मां चण्डी की पूजा करते और जयकारा लगाते हुए रणभूमि को प्रस्थान करते थे।

कुछ लोगों का मानना है कि इस स्थान पर प्राचीन राज्य सिरपुर या आरंग के सैनिकों की छावनी रही होगी। इस देवी स्थल के आसपास सैनिकों की छावनी थी। वीर सैनिकों के रहने के कारण ही इस गांव का नाम बीरकोनी पड़ा, जो बाद में अपभ्रंश होकर बिरकोनी हो गया। मंदिर स्थल पर सैनिक छावनी होने के अनेक प्रमाण मौजूद हैं। एक आयताकार क्षेत्र है, जिसे लोग हाथी गोडऱा कहते हैं, जिसका अर्थ है हाथी रखने का स्थान। हाथी गोडऱा का भग्नावशेष यहां मौजूद है। युद्ध में जाने के पूर्व सैनिक मां चण्डी की पूजा करते थे।
