छत्तीसगढ़ की राजनीति इस वक्त एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां घटनाएं दल-बदल ही नहीं रह जातीं, यहां सत्ता की पूरी बिसात को नए सिरे से सजाने का संकेत देती हैं। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के साथ सात सांसदों का भाजपा की ओर झुकाव और इसी क्रम में संदीप पाठक का पाला बदलना, महज एक राजनीतिक खबर नहीं है। यह एक सुनियोजित तरीके से सियासी ताकत के स्थानांतरण का संकेत भी माना जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम को तीन स्तरों यानि रणनीति, संगठन और संदेश पर समझने की जरूरत है ।
भाजपा की रणनीति में विस्तार के साथ पुनर्संरचना
भाजपा के लिए यह महज संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है। असल खेल संगठन के माइक्रो मैनेजमेंट का है। संदीप पाठक जैसे रणनीतिकार का भाजपा में आना इस बात का संकेत है कि पार्टी अब छत्तीसगढ़ में अपने पारंपरिक ढांचे से आगे बढ़कर एक डेटा-ड्रिवन और बूथ-केंद्रित मॉडल को और आक्रामक बनाना चाहती है। राज्य निर्माण के बाद से छत्तीसगढ़ में भाजपा मजबूत संगठन वाली पार्टी मानी जाने लगी है, लेकिन पिछले चुनावों ने यह भी दिखाया कि कुछ इलाकों में उसका कैडर ढीला पड़ा है। ऐसे में संदीप पाठक का अनुभव चुनावी इंजीनियरिंग, संसाधन प्रबंधन और कार्यकर्ता नेटवर्किंग, भाजपा के लिए फोर्स मल्टीप्लायर साबित हो सकता है। यहां एक पेच भी है। भाजपा का अपना स्थापित नेतृत्व, अपनी कार्यशैली और शक्ति संतुलन है। ऐसे में बाहर से आए रणनीतिकार को जगह देना, उसे प्रभावी भूमिका देना और साथ ही पुराने नेताओं की नाराजगी को नियंत्रित रखना, यह भाजपा के लिए एक बड़ी इन-हाउस मैनेजमेंट टेस्ट होगा। अगर यह संतुलन बिगड़ा, तो लाभ से ज्यादा नुकसान भी हो सकता है।
आम आदमी पार्टी से सिर्फ चेहरा नहीं, दिमाग भी गया
आम आदमी पार्टी के लिए यह घटनाक्रम सीधा-सीधा रणनीतिक खालीपन यानि स्ट्रेटिजिक वैक्यूम पैदा करता है। संदीप पाठक महज एक संगठन प्रभारी नहीं थे, वे आम आदमी पार्टी के वह धुरी थे, जिस पर पार्टी का पूरा विस्तार मॉडल टिका था। छत्तीसगढ़ में ‘आप’ पहले ही संघर्ष के दौर में थी। नेतृत्व बार-बार बदल रहा था, स्थानीय स्तर पर स्पष्ट चेहरा नहीं बन पा रहा था और कार्यकर्ताओं में स्थायित्व का अभाव स्पस्ट महसूस किया जाने लगा था। ऐसे में पार्टी के छत्तीसगढ़ प्रभारी संदीप पाठक दिल्ली की रणनीति और छत्तीसगढ़ की जमीनी हकीकत के बीच एक कनेक्टिंग लिंक थे। अब उनके जाने के बाद सबसे बड़ा संकट विश्वास का है। कार्यकर्ता यह सवाल पूछ सकते हैं कि जिस नेतृत्व के भरोसे उन्होंने राजनीतिक जोखिम उठाया, वही नेतृत्व अब विरोधी खेमे में क्यों खड़ा है। राजनीति में विचारधारा से ज्यादा विश्वसनीयता मायने रखती है, और यही पूंजी ‘आप’ के हाथ से फिसलती दिख रही है।
तीसरे विकल्प की राजनीति का सपना या भ्रम
छत्तीसगढ़ में ‘आप’ ने खुद को भाजपा और कांग्रेस के बीच तीसरे विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश की थी। 2018 और 2023 के चुनावों में भले ही सीटें नहीं मिलीं, लेकिन कुछ इलाकों खासतौर पर भानुप्रतापपुर में पार्टी ने वोटों के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या यह तीसरा विकल्प कभी ठोस जमीन पर खड़ा हो पाया था, या वह सिर्फ पब्लिक परसेप्शन बिल्डिंग तक सीमित था। लगातार नेतृत्व परिवर्तन, संगठनात्मक अस्थिरता और अब शीर्ष रणनीतिकार का पार्टी छोड़ देना, इन सबने यह संकेत दे दिया है कि ‘आप’ अभी भी छत्तीसगढ़ में प्रयोग की अवस्था से बाहर नहीं निकल पाई है। ऐसे में तीसरे विकल्प की राजनीति फिलहाल एक अधूरा प्रयोग नजर आती है।
छत्तीसगढ़ की सियासत में अब खेल और जटिल
इस पूरे घटनाक्रम का असर छत्तीसगढ़ की राजनीति पर साफ दिखेगा, लेकिन यह असर सीधा नहीं, बहुस्तरीय होगा। पहला असर आप का संगठन और कमजोर होगा। जो कार्यकर्ता अब तक विकल्प की उम्मीद में टिके थे, वे या तो निष्क्रिय हो जाएंगे या फिर भाजपा या कांग्रेस की ओर रुख करेंगे। दूसरा असर भाजपा को एक बौद्धिक बढ़त मिलेगी। चुनाव अब रैलियों और नारों से नहीं, डेटा, माइक्रो-टारगेटिंग और बूथ मैनेजमेंट नए तरीकों से से जीते जाएंगे। इस मोर्चे पर भाजपा और मजबूत हो सकती है। लेकिन यहां एक और अहम बात भी समझनी होगी कि छत्तीसगढ़ की राजनीति महज रणनीति से नहीं चलती। यहां जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय मुद्दे भी उतने ही निर्णायक होते हैं। बाहरी रणनीतिकार तभी सफल होता है, जब वह स्थानीय संवेदनाओं को समझे और उन्हें साधे।
तो क्या सिर्फ चाल बदली है, खेल अभी बाकी है
इस पूरे घटनाक्रम को अगर एक लाइन में समझना हो, तो कहा जा सकता है कि खिलाड़ी बदले हैं, लेकिन खेल अभी खुला है। संदीप पाठक का भाजपा में जाना भाजपा के लिए अवसर के साथ परीक्षा भी है। आम आदमी पार्टी के लिए यह आत्ममंथन का समय है, और छत्तीसगढ़ की राजनीति के लिए यह संकेत है कि आने वाले चुनावों में मुकाबला दो दलों के बीच नहीं, रणनीतियों के स्तर पर भी होगा। संदीप पाठक का जुड़ाव रायगढ़ से है। यहां यह भी सीधे तौर पर समझना होगा कि सियासत की बिसात पर यह चाल अचानक नहीं चली जाती है। यह लंबे समय से तैयार हो रही रणनीति का हिस्सा लगती है। अब देखना यह है कि अगली चाल कौन चलता है, और किसकी बिसात ज्यादा मजबूत साबित होती है।

