देश कई बार ऐसे मोड़ों पर खड़ा हुआ, जब विदेशी मुद्रा भंडार घटा
देश इन दिनों एक विचित्र दौर से गुजर रहा है। मंचों पर आत्मनिर्भरता के गीत गाए जा रहे हैं। बाजार में बचत के मंत्र दिए जा रहे हैं। सड़कों पर साइकिलें दिखाई जा रही हैं। कहीं मंत्री साइकिल चला रहे हैं। कहीं अधिकारी पैदल कार्यालय पहुंचने की तस्वीरें खिंचवा रहे हैं। तो कहीं यह बताया जा रहा है कि कम ईंधन खर्च करना ही राष्ट्रसेवा है। साइकिल चलाना गलत नहीं है। साइकिल तो स्वास्थ्य, पर्यावरण और सादगी का प्रतीक रही है। सवाल यह है कि जब साइकिल के पीछे दस गाड़ियों का काफिला चल रहा हो, तब वह सादगी का संदेश है या कैमरे के लिए सजाया गया दृश्य। देश की अर्थव्यवस्था जब दबाव में होती है, तब सबसे पहले प्रतीकों का बाजार गर्म होता है। कभी जनता से कहा जाता है कि सोना मत खरीदिए, विदेशी मुद्रा बचाइए। कभी यह सलाह आती है कि अनावश्यक यात्रा कम कीजिए। कहीं कहा जाता है कि घर से कम निकलें, पेट्रोल-डीजल बचेगा। सुनने में यह सब उचित लगता है, क्योंकि संसाधनों का संयमित उपयोग हर जिम्मेदार समाज की पहचान है। परंतु समस्या तब शुरू होती है जब त्याग जनता और प्रदर्शन सत्ता के हिस्से आता है।
अब यदि
कोई मंत्री साइकिल पर सचिवालय जाए और पीछे सुरक्षा, मीडिया, एस्कॉर्ट
और चमचमाती एसयूवी का जुलूस चले, तो यह दृश्य जनता को
प्रेरित कम और उलझन में अधिक डालता है। आम नागरिक सोचता है कि क्या यह वास्तव में
ईंधन बचाने का प्रयास है, या फिर यह बताने का तरीका कि देखिए,
हम भी संघर्ष कर रहे हैं। संघर्ष का वास्तविक अर्थ तब होता है जब
सुविधा छोड़ने का निर्णय भीतर से निकले, न कि फोटो फ्रेम में
फिट होने के लिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि देश दिखावे की बचत और वास्तविक सुधार के बीच अंतर समझे। यदि सचमुच ईंधन बचाना है तो सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा। शहरों को ऐसा बनाना होगा जहां लोग मजबूरी नहीं, सुविधा के कारण साइकिल चलाएं। सरकारी खर्चों में पारदर्शिता लानी होगी। अनावश्यक सरकारी वैभव पर अंकुश लगाना होगा। जनता को कम खर्च करो कहना आसान है, लेकिन शासन का पहला धर्म यह होना चाहिए कि वह स्वयं उदाहरण बने। विडंबना यह है कि हम आधुनिकता के युग में रहते हुए भी बार-बार अभावों की भाषा सुनने लगे हैं। कभी बिजली बचाइए, कभी पानी बचाइए, कभी पेट्रोल बचाइए, कभी सोना मत खरीदिए। ऐसा लगता है जैसे विकास की चमकदार इमारत के पीछे कहीं न कहीं संसाधनों की चिंता लगातार सिर उठा रही है। भारत की अर्थव्यवस्था पहली बार दबाव में नहीं है। इतिहास गवाह है कि देश कई बार ऐसे मोड़ों पर खड़ा हुआ, जब विदेशी मुद्रा भंडार घटा, रुपए पर दबाव बढ़ा और सरकारों को जनता से संयम की अपील करनी पड़ी।

भारतीय समाज ने हमेशा संतुलन का मार्ग चुना है। यहां सादगी का सम्मान है, लेकिन पाखंड का नहीं। यदि साइकिल चलाना संदेश है, तो वह संदेश पूर्ण होना चाहिए। साइकिल अकेली चले, काफिला नहीं। बचत जनता से शुरू हो, पर शासन पर भी लागू हो। और सबसे महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए जनता को केवल त्याग का उपदेश नहीं, अवसर और भरोसा भी दिया जाए। इतिहास का निष्कर्ष साफ है कि अर्थव्यवस्था महज त्याग के प्रतीकों से नहीं संभलती। जनता कुछ समय तक संयम रख सकती है, लेकिन स्थायी समाधान उत्पादन, रोजगार, नवाचार और नीति की स्पष्टता से ही निकलता है। अन्यथा आने वाले समय में इतिहास शायद यह लिखेगा कि देश आधुनिकता की ओर बढ़ते-बढ़ते अचानक प्रतीकों के ऐसे मोड़ पर पहुंच गया, जहां साइकिल आगे थी और व्यवस्था का पूरा काफिला पीछे।

