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साइकिल में नेता जी और पीछे उनका काफिला
साइकिल में नेता जी और पीछे उनका काफिला
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साइकिल में सरकार : देश को दिखावटी नहीं ईमानदार पहल की जरूरत

देश में आर्थिक दबावों के बीच ईंधन बचाने, सादगी अपनाने और अनावश्यक खर्च कम करने जैसे संदेश लगातार दिए जा रहे हैं। नेता और अधिकारी साइकिल चलाकर प्रतीकात्मक रूप से बचत और संयम का संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन जब उनके पीछे सुरक्षा और वाहनों का लंबा काफिला चलता है, तब यह दृश्य जनता के मन में कई सवाल भी खड़े करता है। कलमकार ने अपने इस विचारोत्तेजक लेख के माध्यम से इसी विरोधाभास को केंद्र में रखकर लिखते हैं कि अर्थव्यवस्था प्रतीकात्मक उपायों से नहीं सुधरती, ठोस नीतियों, उत्पादन, रोजगार और पारदर्शिता से मजबूत होती है।

कलमकार
14 May 2026, 08:03 PM
📍 रायपुर

देश कई बार ऐसे मोड़ों पर खड़ा हुआ, जब विदेशी मुद्रा भंडार घटा

देश इन दिनों एक विचित्र दौर से गुजर रहा है। मंचों पर आत्मनिर्भरता के गीत गाए जा रहे हैंबाजार में बचत के मंत्र दिए जा रहे हैं सड़कों पर साइकिलें दिखाई जा रही हैं। कहीं मंत्री साइकिल चला रहे हैंकहीं अधिकारी पैदल कार्यालय पहुंचने की तस्वीरें खिंचवा रहे हैंतो कहीं यह बताया जा रहा है कि कम ईंधन खर्च करना ही राष्ट्रसेवा है। साइकिल चलाना गलत नहीं है। साइकिल तो स्वास्थ्य, पर्यावरण और सादगी का प्रतीक रही है। सवाल यह है कि जब साइकिल के पीछे दस गाड़ियों का काफिला चल रहा हो, तब वह सादगी का संदेश है या कैमरे के लिए सजाया गया दृश्य। देश की अर्थव्यवस्था जब दबाव में होती है, तब सबसे पहले प्रतीकों का बाजार गर्म होता है। कभी जनता से कहा जाता है कि सोना मत खरीदिए, विदेशी मुद्रा बचाइए। कभी यह सलाह आती है कि अनावश्यक यात्रा कम कीजिए। कहीं कहा जाता है कि घर से कम निकलें, पेट्रोल-डीजल बचेगा। सुनने में यह सब उचित लगता है, क्योंकि संसाधनों का संयमित उपयोग हर जिम्मेदार समाज की पहचान है। परंतु समस्या तब शुरू होती है जब त्याग जनता और प्रदर्शन सत्ता के हिस्से आता है।

अब यदि कोई मंत्री साइकिल पर सचिवालय जाए और पीछे सुरक्षा, मीडिया, एस्कॉर्ट और चमचमाती एसयूवी का जुलूस चले, तो यह दृश्य जनता को प्रेरित कम और उलझन में अधिक डालता है। आम नागरिक सोचता है कि क्या यह वास्तव में ईंधन बचाने का प्रयास है, या फिर यह बताने का तरीका कि देखिए, हम भी संघर्ष कर रहे हैं। संघर्ष का वास्तविक अर्थ तब होता है जब सुविधा छोड़ने का निर्णय भीतर से निकले, न कि फोटो फ्रेम में फिट होने के लिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि देश दिखावे की बचत और वास्तविक सुधार के बीच अंतर समझे। यदि सचमुच ईंधन बचाना है तो सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा। शहरों को ऐसा बनाना होगा जहां लोग मजबूरी नहीं, सुविधा के कारण साइकिल चलाएं। सरकारी खर्चों में पारदर्शिता लानी होगी। अनावश्यक सरकारी वैभव पर अंकुश लगाना होगा। जनता को कम खर्च करो कहना आसान है, लेकिन शासन का पहला धर्म यह होना चाहिए कि वह स्वयं उदाहरण बने। विडंबना यह है कि हम आधुनिकता के युग में रहते हुए भी बार-बार अभावों की भाषा सुनने लगे हैं। कभी बिजली बचाइए, कभी पानी बचाइए, कभी पेट्रोल बचाइए, कभी सोना मत खरीदिए। ऐसा लगता है जैसे विकास की चमकदार इमारत के पीछे कहीं न कहीं संसाधनों की चिंता लगातार सिर उठा रही है। भारत की अर्थव्यवस्था पहली बार दबाव में नहीं है। इतिहास गवाह है कि देश कई बार ऐसे मोड़ों पर खड़ा हुआ, जब विदेशी मुद्रा भंडार घटा, रुपए पर दबाव बढ़ा और सरकारों को जनता से संयम की अपील करनी पड़ी।

सबसे चर्चित उदाहरण वर्ष 1991 का है। उस समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि देश के पास कुछ सप्ताह के आयात लायक डॉलर बचे थे। स्थिति इतनी गंभीर हुई कि भारत को अपना सोना तक गिरवी रखना पड़ा। उस दौर में बचत की अपील करने के बजाए संरचनात्मक सुधार किए। लाइसेंस राज में ढील दी गई, विदेशी निवेश को अवसर मिला और अर्थव्यवस्था को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए खोला गया। यानी समाधान प्रतीकात्मक नहीं, नीतिगत था। इसके पहले 1960 और 70 के दशक में भी देश खाद्यान्न संकट, तेल संकट और युद्धजनित आर्थिक दबावों से जूझ चुका है। तब सादा जीवन केवल भाषण का हिस्सा नहीं था। लोग सप्ताह में एक दिन उपवास रखते थे, अनाज बचाने की अपील होती थी और सरकारें उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देती थीं। हरित क्रांति उसी संकट की कोख से निकली, जिसने भारत को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया। वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी में भी भारत प्रभावित हुआ, लेकिन तब सरकार ने निवेश, बैंकिंग और रोजगार आधारित प्रोत्साहन दिए। बाजार में विश्वास बनाए रखने की कोशिश की गई। और भारत अपेक्षाकृत तेजी से उबर गया।

भारतीय समाज ने हमेशा संतुलन का मार्ग चुना है। यहां सादगी का सम्मान है, लेकिन पाखंड का नहीं। यदि साइकिल चलाना संदेश है, तो वह संदेश पूर्ण होना चाहिए। साइकिल अकेली चले, काफिला नहीं। बचत जनता से शुरू हो, पर शासन पर भी लागू हो। और सबसे महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए जनता को केवल त्याग का उपदेश नहीं, अवसर और भरोसा भी दिया जाए। इतिहास का निष्कर्ष साफ है कि अर्थव्यवस्था महज त्याग के प्रतीकों से नहीं संभलती। जनता कुछ समय तक संयम रख सकती है, लेकिन स्थायी समाधान उत्पादन, रोजगार, नवाचार और नीति की स्पष्टता से ही निकलता है। अन्यथा आने वाले समय में इतिहास शायद यह लिखेगा कि देश आधुनिकता की ओर बढ़ते-बढ़ते अचानक प्रतीकों के ऐसे मोड़ पर पहुंच गया, जहां साइकिल आगे थी और व्यवस्था का पूरा काफिला पीछे।

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