छत्तीसगढ़ की सामाजिक संरचना हमेशा से विविधता में एकता की मिसाल रही है। जहां अलग-अलग जातियों, समुदायों और परंपराओं के बावजूद आपसी भाईचारा और सहयोग की भावना मजबूत रही है। समय के साथ सामाजिक समीकरणों में बदलाव आया है, लेकिन अब आवश्यकता इस बात की है कि छत्तीसगढ़िया समाज फिर से अपनी मूल पहचान सद्भाव, समरसता और मितानी को मजबूत करे।
इसी संदर्भ में कीर्तिमान कार्यालय में सौजन्य
भेंट के दौरान पिथौरा तहसील साहू संघ के अध्यक्ष मनोहर साहू एवं बागबाहरा तहसील
साहू संघ के अध्यक्ष एवन साहू ने वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नीरज गजेंद्र से विस्तृत
चर्चा की। इस चर्चा में छत्तीसगढ़ के वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर गहन
विचार-विमर्श हुआ।
दोनों सामाजिक प्रतिनिधियों ने चिंता व्यक्त करते
हुए कहा कि राज्य के सामाजिक ढांचे में बाहरी प्रभावों और स्वार्थपरक राजनीतिक
हस्तक्षेपों के कारण मूल छत्तीसगढ़िया समाजों के हित प्रभावित हो रहे हैं। उनका
मानना है कि दिगर प्रांतों से आए कुछ समूहों द्वारा स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक
संतुलन को कमजोर करने की कोशिशें देखी जा रही हैं, जिससे समाजों के बीच अनावश्यक दूरी बढ़ रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक
व्यवस्था में भले ही विभिन्न जातियों के बीच रोटी-बेटी के संबंध न रहे हों, लेकिन
मितानी जैसी अनूठी परंपरा ने सभी समाजों को एक सूत्र में बांधे रखा। यह संबंध सामाजिक
नहीं, भावनात्मक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक रहा है।
जहां हर व्यक्ति दूसरे के सुख-दुख में बराबरी
से सहभागी बनता था।
मनोहर साहू और एवन साहू ने इस बात पर बल दिया कि
वर्तमान समय में इन परंपराओं का क्षरण हो रहा है, जो समाज के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि
राजनीतिक स्वार्थ और वर्चस्व की होड़ ने सामाजिक समरसता को प्रभावित किया है,
जिससे आपसी विश्वास और सहयोग की भावना कमजोर पड़ रही है।
डॉ. नीरज गजेंद्र के साथ हुई चर्चा में यह बात उभरकर सामने आई कि यदि छत्तीसगढ़ को अपनी मूल पहचान को बनाए रखना है, तो सभी समाजों को एक मंच पर आकर संवाद और सहयोग की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। समाज के नेताओं और प्रबुद्ध वर्ग की जिम्मेदारी है कि वे विभाजनकारी सोच से ऊपर उठकर एकजुटता का संदेश दें।
