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महिला आरक्षण बिल
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आरक्षण बिल : विरोध से समर्थन तक, आखिर क्यों बदले अखिलेश यादव?

संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को लेकर सियासी पारा फिर से चढ़ गया है. तीन महीने पहले जिन अखिलेश यादव ने इस बिल का पुरजोर विरोध किया था, अब उन्होंने अचानक रुख बदल लिया है. अखिलेश यादव के इस बदले हुए तेवर ने दिल्ली की राजनीति में हलचल मचा दी है.

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प्रकाशित: 08 Jul 2026, 11:39 AM · अपडेट: 17 Oct 2026, 07:55 AM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को लेकर सियासी पारा फिर से चढ़ गया है। तीन महीने पहले जिन अखिलेश यादव ने इस बिल का पुरजोर विरोध किया था, अब उन्होंने अचानक रुख बदल लिया है। अखिलेश यादव के इस बदले हुए तेवर ने दिल्ली की राजनीति में हलचल मचा दी है।
अप्रैल में जब संसद में यह बिल चर्चा के लिए आया था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अखिलेश यादव को अपना मित्र बताया था। हालांकि तब अखिलेश ने सरकार का साथ नहीं दिया और बिल पास नहीं हो सका था। अब तीन महीने बाद मॉनसून सत्र से पहले अखिलेश ने संकेत दिए हैं कि अगर सरकार उनकी तीन शर्तें मान ले, तो सपा अपना समर्थन दे सकती है।

अखिलेश ने रखी ये बड़ी मांगें

सपा प्रमुख ने महिला संगठनों और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों से मुलाकात के बाद अपनी स्थिति साफ की है। अखिलेश यादव की मुख्य मांगें इस प्रकार हैं। पहला, महिला आरक्षण को 2027 के विधानसभा चुनाव से ही लागू किया जाए दूसरा, परिसीमन के जरिए राज्यसभा और विधान परिषद में भी महिलाओं के लिए सीटें बढ़ाई जाएं। तीसरा, आरक्षण के दायरे में पिछड़े समाज और मुस्लिम महिलाओं का कोटा तय किया जाए।

क्यों बदला अखिलेश का रुख

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव की यह रणनीति यूपी के आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। अप्रैल के मुकाबले अब सियासी समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। सत्ता पक्ष के पास बहुमत का आंकड़ा मजबूत हो रहा है, जिसे देखते हुए अखिलेश अब बिल का सीधे विरोध करने के बजाय शर्तों के साथ समर्थन की राह अपना रहे हैं। अभी तक सरकार की तरफ से इन शर्तों पर कोई आधिकारिक जवाब नहीं आया है। हालांकि, अखिलेश के इस कदम को एक बड़े राजनीतिक दांव के रूप में देखा जा रहा है। अगर केंद्र सरकार इन मांगों पर कोई सकारात्मक फैसला लेती है, तो संसद के मॉनसून सत्र में महिला आरक्षण पर तस्वीर बदल सकती है।
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