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खैरागढ़ में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे का मामला
खैरागढ़ में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे का मामला
खैरागढ़-छुईखदान-गंडई

कार्रवाई : भू-कब्जे का बड़ा खेल, गरीब दुकानदारों पर चला प्रशासनिक डंडा

न्यायालय परिसर के सामने छोटे ठेले और खोमचे हटाने की कार्रवाई की गई, जबकि उसी क्षेत्र में सरकारी नजूल जमीन को 22 हिस्सों में बांटकर की गई कथित अवैध प्लाटिंग और कब्जों पर आठ महीने बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

कीर्तिमान डेस्क
कीर्तिमान डेस्क
28 May 2026, 04:43 PM
📍 खैरागढ
शहर में प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर बड़ा विरोधाभास सामने आया है। एक ओर न्यायालय परिसर के सामने वर्षों से सड़क किनारे ठेला और खोमचा लगाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाले छोटे व्यवसायियों को हटाने के लिए प्रशासन सक्रिय दिखाई दिया, वहीं उसी परिसर के सामने सरकारी जमीन पर हुए कथित अवैध कब्जों और प्लाटिंग पर आठ महीने बाद भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी है। इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन की निष्पक्षता और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एडवर्ड पार्क के सामने की नजूल भूमि का मामला

पूरा मामला एडवर्ड पार्क के सामने न्यायालय परिसर से लगी नजूल भूमि का है। तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और पटवारी की संयुक्त जांच में यह स्पष्ट हुआ कि नजूल प्लॉट नंबर 114 एवं 115, मूल खसरा नंबर 169 की सरकारी जमीन को बिना वैधानिक अनुमति के 22 हिस्सों में बांटकर अलग-अलग लोगों को बेचा गया। जांच दस्तावेजों के अनुसार वर्तमान में इस भूमि पर 17 कब्जाधारी मौजूद हैं। कई हिस्सों में पक्के निर्माण भी कर लिए गए हैं। जांच रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जमीन के अलग-अलग हिस्सों की रजिस्ट्रियां विभिन्न लोगों के नाम पर कर दी गईं, जबकि संबंधित भूमि सरकारी श्रेणी में दर्ज है।

 भूमि पर हुआ कब्जा

राजस्व अभिलेखों के अनुसार खसरा नंबर 169 का कुल रकबा 2.259 हेक्टेयर दर्ज है और इसकी भूमि प्रकृति “छोटे झाड़ का जंगल एवं घास भूमि” अंकित है। नियमानुसार ऐसी भूमि का निजी उपयोग, प्लाटिंग, विक्रय अथवा व्यावसायिक हस्तांतरण नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद लगभग 85,627 वर्गफीट सरकारी जमीन की रजिस्ट्रियां किए जाने का मामला सामने आया है।

नगर निवेश विभाग ने भी माना अवैध

नगर एवं ग्राम निवेश विभाग ने भी अपनी जांच रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख किया है कि संबंधित भूमि का कोई वैध ले-आउट स्वीकृत नहीं किया गया था। विभाग ने पूरी प्रक्रिया को अवैध प्लाटिंग की श्रेणी में माना है। इसके बाद 29 सितंबर 2025 को कलेक्टर कार्यालय द्वारा नगर पालिका परिषद को नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश भी जारी किए गए थे। कलेक्टर कार्यालय के आदेश के बावजूद आठ महीने बाद भी न तो अवैध निर्माण हटाए गए और न ही प्लाटिंग से जुड़े जिम्मेदार लोगों पर कोई कठोर कार्रवाई हुई। इससे प्रशासन की कार्रवाई केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित होने के आरोप लगने लगे हैं।

गरीबों के ठेले हटाने की तैयारी

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस न्यायालय परिसर के सामने गरीबों के ठेले हटाने की तैयारी की गई, उसी परिसर के सामने सरकारी जमीन पर हुए कथित अवैध कब्जे आज भी जस के तस बने हुए हैं। मुख्य मार्ग से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर प्रशासन ने माहौल बनाया, जिससे छोटे दुकानदारों में भय का माहौल बन गया।कार्रवाई के दौरान कई छोटे दुकानदार डर के कारण अपना सामान समेटते नजर आए। पालिका कर्मचारी और पुलिस बल घंटों मौके पर मौजूद रहे, लेकिन नगर पालिका और राजस्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे। अंततः केवल दो ठेले जब्त कर औपचारिक कार्रवाई पूरी कर दी गई।

स्थानीय लोगों ने उठाए सवाल

इस घटनाक्रम के बाद स्थानीय लोगों का कहना है कि गरीबों और छोटे व्यवसायियों पर कार्रवाई तुरंत हो जाती है, लेकिन सरकारी जमीन पर कथित अवैध प्लाटिंग कर करोड़ों की संपत्ति खड़ी करने वालों पर कार्रवाई फाइलों और विभागीय पत्राचार तक सीमित रह जाती है।मामले में उप पंजीयक कार्यालय की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि नगर तथा ग्राम निवेश विभाग की अनुमति के बिना रजिस्ट्रियां की गईं, जबकि राजस्व विभाग, एसडीएम कार्यालय और नगर निवेश विभाग अपनी जांच में संबंधित प्लाटिंग को अवैध बता चुके हैं।

SIT जांच और एफआईआर की मांग

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय एसआईटी जांच कराने, सभी 22 रजिस्ट्रियों को निरस्त करने, संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच करने और भू-माफियाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग उठाई है।मामले में नगर पालिका परिषद के सीएमओ पुनीत राम वर्मा ने कहा कि उन्होंने दो महीने पहले ही पदभार ग्रहण किया है और पूरी फाइल का परीक्षण करने के बाद ही स्थिति स्पष्ट कर पाएंगे।

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