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खैरागढ़ में पार्क जमीन घोटाला
खैरागढ़ में पार्क जमीन घोटाला
खैरागढ़-छुईखदान-गंडई

पार्क घोटाला : राजा की मूर्ति चोरी से लेकर अवैध कॉलोनी तक, रसूख के आगे बेबस हुई पालिका, कार्रवाई पर रहस्यमयी ब्रेक!

छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक शहर खैरागढ़ में एक बड़ा जमीन घोटाला सामने आया है, जिसमें सिविल लाइन क्षेत्र की सरकारी और नजूल भूमि पर अवैध कॉलोनी काटे जाने का गंभीर मामला उजागर हुआ है। SDM जांच में अवैध प्लाटिंग की पुष्टि हो चुकी है और कलेक्टर कार्यालय ने नगर पालिका को FIR व ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के निर्देश भी दिए हैं।

कीर्तिमान न्यूज
27 May 2026, 03:52 PM
खैरागढ़

छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक शहर खैरागढ़ में एक ऐसा जमीन घोटाला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक तंत्र और भू-माफियाओं के बीच के गठजोड़ को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। शहर के सिविल लाइन क्षेत्र (प्लॉट नंबर 114 और 115) में मेंटेनेंस खसरा और नजूल भूमि पर काटी गई अवैध कॉलोनी का यह मामला अब सिर्फ जमीनी हेरफेर तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब प्रशासनिक नाकामी और 'ऊपर' के दबाव की एक जिंदा मिसाल बन चुका है।

सबसे बड़ा और तीखा सवाल अब यह गूंज रहा है: "जब एसडीएम (SDM) की जांच में अवैध प्लाटिंग की पुष्टि हो चुकी है, कलेक्टर कार्यालय ने डंडा चलाकर कार्रवाई के निर्देश दे दिए हैं, तो फिर नगर पालिका के हाथ किसने बांध रखे हैं?"

इतिहास के पन्नों से 'अवैध कॉलोनी' तक का सफर

यह पूरा मामला किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। जिस जमीन पर आज कंक्रीट का जंगल खड़ा किया जा रहा है, उसका एक गौरवशाली इतिहास था:

  • आजादी से पहले: यह जमीन सरकारी रिकॉर्ड में 'अल्फ्रेड पार्क' (एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क और बाड़ी) के रूप में दर्ज थी।

  • राजा की मूर्ति और चोरी: देश की आजादी के बाद यहां खैरागढ़ के राजा लालबहादुर सिंह की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई थी। लेकिन भू-माफियाओं की गिद्ध नजर इस बेशकीमती जमीन पर थी। षड्यंत्र के तहत राजा की मूर्ति को चोरी छिपे हटाकर गलाने के लिए ले जाया जा रहा था, जिसे बाद में राजा शिवेंद्र बहादुर ने बरामद कर डोंगरगढ़ स्थित 'लाल निवास' में सुरक्षित स्थापित कराया।

  • टुकड़ों में बिकी जमीन: जैसे ही पार्क सूना हुआ, मेंटेनेंस खसरे की इस सरकारी जमीन को टुकड़ों-टुकड़ों में बांटकर रसूखदारों और भू-कारोबारियों को बेचना शुरू कर दिया गया।

कोई ले-आउट पास ही नहीं 

इस मामले में सबसे नया और चौंकाने वाला मोड़ नगर एवं ग्राम निवेश विभाग (TNCP) की रिपोर्ट से आया है। विभाग ने साफ कर दिया है कि इस विवादित जमीन का कभी कोई वैध ले-आउट पास ही नहीं हुआ था

नियमों की धज्जियां: बिना टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की अनुमति के, बिना कॉलोनी नाइजर लाइसेंस के, वर्षों तक इस सरकारी जमीन की रजिस्ट्रियां होती रहीं, धड़ल्ले से नामांतरण (Mutation) किए गए और अवैध निर्माणों की झड़ी लगा दी गई। सवाल यह है कि उस वक्त पंजीयन कार्यालय और राजस्व अमला क्या आंखें मूंदकर बैठा था?

आदेश की कॉपियां टेबल पर, लेकिन रसूखदारों के आगे फाइल बंद!

जांच का चक्रव्यूह तो घूमा, लेकिन एक्शन के मुहाने पर आकर थम गया:

  1. एसडीएम की जांच: एसडीएम कार्यालय ने इस पूरे घोटाले की बारीक जांच की और अवैध प्लाटिंग को 100% सच पाया। रिपोर्ट कलेक्टर को सौंपी गई।

  2. कलेक्टर का निर्देश: कलेक्टर कार्यालय की नजूल शाखा ने तत्परता दिखाते हुए मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) को कड़ा पत्र जारी किया। निर्देश था कि छत्तीसगढ़ नगर पालिका कॉलोनाइजर नियमों के तहत तत्काल एफआईआर (FIR) और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जाए।

  3. नगर पालिका की 'रहस्यमयी' चुप्पी: यहीं से कहानी में असली सस्पेंस शुरू होता है। आदेश मिलने के हफ्तों बाद भी नगर पालिका ने न तो किसी को नोटिस थमाया, न ही किसी निर्माण पर बुलडोजर चला।

किनके इशारे पर नाच रहा है प्रशासन?

खैरागढ़ के चौक-चौराहों और चाय की टपरियों पर अब खुलकर चर्चा होने लगी है कि आखिर वह 'अदृश्य हाथ' किसका है? इस घोटाले के पीछे शहर के कई सफेदपोश और रसूखदार चेहरों के नाम सामने आ रहे हैं।

जनता अब सीधे तंज कस रही है:

"खैरागढ़ में शायद अवैध कॉलोनी काटना कोई गुनाह नहीं है, बल्कि उस अवैध कॉलोनी पर कार्रवाई की हिम्मत जुटाना सबसे बड़ा अपराध बन गया है।"

आम जनता के गंभीर सवाल और ताजा स्थिति

इस मामले ने अब एक जन-आंदोलन का रूप लेना शुरू कर दिया है। शहर के जागरूक नागरिकों ने प्रशासन के सामने कुछ तीखे सवाल दागे हैं:

  • यदि बच्चों के खेलकूद के पार्क, धरोहर और मेंटेनेंस खसरे की सुरक्षित जमीनों को रसूखदार डकार जाएंगे, तो आम सरकारी जमीनों को भू-माफियाओं से कौन बचाएगा?

  • क्या नगर पालिका प्रशासन पूरी जमीन के बिक जाने और वहां वीआईपी बंगले तन जाने का इंतजार कर रहा है, ताकि बाद में 'कब्जा' हटाने का नाटक किया जा सके?

सूत्रों के मुताबिक, नगर पालिका की इस सुस्ती और संदिग्ध भूमिका को लेकर अब इस मामले को उच्च स्तर (राजधानी) तक ले जाने की तैयारी चल रही है। यदि स्थानीय प्रशासन ने जल्द ही इन रसूखदार भू-माफियाओं पर शिकंजा नहीं कसा, तो यह मामला कोर्ट की दहलीज तक पहुंच सकता है।

अब देखना यह है कि कलेक्टर के आदेश का पालन होता है या फिर रसूख की चमक के आगे कानून एक बार फिर बौना साबित होता है।

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