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बलौदाबाजार की 40 महिलाओं ने सीखी पैरा आर्ट
बलौदाबाजार की 40 महिलाओं ने सीखी पैरा आर्ट
सरकारी सूचना

पराली से कला तक का सफर : धान के कटोरे में पैरा आर्ट की नई पहचान, ग्रामीण महिलाओं को मिला हुनर का मंच

छत्तीसगढ़ में धान कटाई के बाद बचने वाले पैरा (पुआल) से बनाई जाने वाली पैरा आर्ट अब ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का नया माध्यम बन रही है। बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के ग्राम लाहौद में 40 महिलाओं को धान और पैरा आर्ट का प्रशिक्षण दिया गया, जिससे वे बेकार समझे जाने वाले पुआल से आकर्षक कलाकृतियां तैयार कर आत्मनिर्भर बन सकेंगी।

कीर्तिमान डेस्क
कीर्तिमान डेस्क
16 Jul 2026, 04:07 PM
रायपुर
छत्तीसगढ़ (धान का कटोरा) में धान की कटाई के बाद बचने वाले श्पैराश् (पराली/पुआल) से बनाई जाने वाली खूबसूरत हस्तकला को पैरा आर्ट कहते हैं। इसके जरिए वेस्ट पैरा का उपयोग कर महापुरुषों और देवी-देवताओं के 3D पोर्ट्रेट और चित्र बनाए जाते हैं। 
पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ यह ग्रामीण आय का भी एक बड़ा साधन बन रहा है।  पैरा आर्ट बेहद दिलचस्प कला है, जिसमें धैर्य, कल्पनाशक्ति और बारीकी की समझ जरूरी है. धीरे-धीरे इस कला का क्रेज लोगों के बीच बढ़ता जा रहा है।

महिलाओं के हुनर को मिली नई पहचान

बलौदाबाजार-भाटापारा जिले की महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और उन्हें आजीविका के नए साधन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जिला प्रशासन द्वारा लगातार विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इसी कड़ी में विकासखंड बलौदाबाजार के अंतर्गत ग्राम लाहौद में स्व-सहायता समूह की 40 महिलाओं को धान एवं पैरा (पुआल) आर्ट का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) ने प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली महिलाओं को प्रमाण पत्र प्रदान किए। इस दौरान उन्होंने महिलाओं द्वारा धान और पैरा से तैयार की गईं विभिन्न सुंदर और आकर्षक कलाकृतियों का अवलोकन किया तथा उनके हुनर की सराहना करते हुए उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।

महिलाओं को मिला गैर-कृषि आजीविका का अवसर

जिला पंचायत सीईओ बलौदाबाजार-भाटापारा ने बताया कि जिला पंचायत की बिहान टीम के संयुक्त प्रयासों से क्षेत्र में गैर-कृषि आजीविका को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी उद्देश्य के साथ छत्तीसगढ़ महतारी संकुल संगठन लाहौद में स्व-सहायता समूह की 40 दीदियों को इस कला का प्रशिक्षण दिलाया गया है। इस प्रशिक्षण के माध्यम से महिलाएं अब स्थानीय स्तर पर अनुपयोगी समझे जाने वाले पैरा (पुआल) और धान से कलाकृतियां बनाकर अपनी अतिरिक्त आय सुनिश्चित कर सकेंगी और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनेंगी।
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