उर्दू ग़ज़ल के मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार को 91 साल की उम्र में भोपाल में निधन हो गया। वे पिछले करीब 14 साल से डिमेंशिया से पीड़ित थे। गुरुवार दोपहर 12:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। शाम 7:30 बजे भोपाल टॉकीज के पास स्थित कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
बशीर बद्र अपने पीछे ऐसी ग़ज़लें और अशआर छोड़ गए हैं, जो पीढ़ियों तक लोगों की जुबान पर जिंदा रहेंगे।
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।”
उनके निधन के बाद महासमुंद से जुड़ी उनकी यादें भी फिर ताजा हो गई हैं। शहर के शायर और साहित्यकार अशोक शर्मा ने बताया कि एक कार्यक्रम के दौरान बशीर बद्र रायपुर आए हुए थे। उस समय वे मशहूर शायर शौक जालंधरी के मेहमान थे।
अशोक शर्मा और व्यंग्यकार लतीफ घोंघी ने उनसे मुलाकात की और विशेष आग्रह कर उन्हें महासमुंद लेकर आए। अगले दिन जनपद पंचायत सभागार में साहित्यिक गोष्ठी आयोजित हुई, जिसमें बशीर बद्र ने अपनी चर्चित ग़ज़लें सुनाईं। उनके साथ शौक जालंधरी और शाद भंडारवी भी मौजूद थे।

महासमुंद के माहौल से हुए थे प्रभावित
अशोक शर्मा ने बताया कि महासमुंद के घरेलू और आत्मीय माहौल से बशीर बद्र बेहद प्रभावित हुए थे। गोष्ठी में स्थानीय रचनाकारों को भी अपनी रचनाएं पढ़ने का मौका दिया गया। इसी दौरान अशोक शर्मा ने अपना यह शे’र पढ़ा—
“कल शहर जब बंद था तो बाप से परिचय हुआ,
वर्ना सोए में गया और जागते लौटा नहीं।”
बशीर बद्र ने इस शे’र की खुलकर तारीफ की थी। बाद में जब अशोक शर्मा का पहला स्वतंत्र ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ, तो उन्होंने उसी शे’र से प्रेरित होकर संग्रह का नाम “बाप से परिचय हुआ” रखा।
अपनी ही ग़ज़ल सुनकर रो पड़े थे
महासमुंद प्रवास के दौरान ग़ज़ल गायिका साधना रहाटगांवकर के निवास पर एक संगीत गोष्ठी भी हुई थी। यहां बशीर बद्र की ग़ज़लों की संगीतात्मक प्रस्तुति दी गई। अपनी रचनाओं को सुरों में सुनकर बशीर बद्र भावुक हो गए थे और उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े थे।
विदा होते समय उन्होंने कहा था कि अब जब भी छत्तीसगढ़ आएंगे, महासमुंद जरूर आएंगे क्योंकि यह शहर उन्हें “घर जैसा” लगता है।
महासमुंद प्रवास के दौरान ग़ज़ल गायिका साधना रहाटगांवकर के निवास पर एक संगीत गोष्ठी भी हुई थी। यहां बशीर बद्र की ग़ज़लों की संगीतात्मक प्रस्तुति दी गई। अपनी रचनाओं को सुरों में सुनकर बशीर बद्र भावुक हो गए थे और उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े थे।
विदा होते समय उन्होंने कहा था कि अब जब भी छत्तीसगढ़ आएंगे, महासमुंद जरूर आएंगे क्योंकि यह शहर उन्हें “घर जैसा” लगता है।
मेरठ दंगों के बाद भोपाल में बस गए थे
1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जला दिया गया था। इस घटना से वे काफी आहत हुए थे और बाद में भोपाल आकर बस गए। उस दर्द को उन्होंने अपने मशहूर शे’र में भी बयां किया—
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”
अशोक शर्मा ने बताया कि बाद में उनकी मुलाकात भोपाल स्थित बशीर बद्र के घर पर भी हुई थी। वहां भी उन्होंने महासमुंद और यहां के लोगों को पूरी आत्मीयता से याद किया।
याददाश्त कमजोर हुई, लेकिन शायरी नहीं भूले
परिवार के अनुसार, डिमेंशिया के कारण उनकी याददाश्त कमजोर हो गई थी। हालांकि जब उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र उनके शेर गुनगुनाती थीं, तो वे कई बार खुद मिसरा पूरा करने लगते थे। मुशायरों की याद आते ही वे “इरशाद... इरशाद...” कहने लगते थे।
बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को आसान भाषा में नई पहचान दी। मोहब्बत, रिश्तों और इंसानी भावनाओं को उन्होंने बेहद सादगी से अपने अशआर में उतारा।
उनका एक और मशहूर शे’र आज भी लोगों को भावुक कर देता है
“मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।”
बशीर बद्र भले अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लें और अशआर हमेशा साहित्य प्रेमियों के दिलों में जिंदा रहेंगे।
