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बढ़ती आत्महत्याओं पर पढ़िए डॉ. नीरज गजेंद्र का विचारोत्तेजक विश्लेषण मुश्किल वक्त गुज़र जाएगा, जीवन बना रहना चाहिए

जब समाज में संवाद कम होने लगता है, तब अवसाद बढ़ने लगता है। पहले गांवों में चौपाल होती थी। परिवार साथ बैठता था। दुख साझा होते थे। आज हर व्यक्ति अपने कमरे और मोबाइल में कैद है। बाहर से सब सामान्य दिखते हैं, लेकिन भीतर गहरी बेचैनी पल रही है। यही अकेलापन धीरे-धीरे मानसिक दुर्बलता में बदल रहा है। जीवन कभी पूर्ण नहीं होता। संघर्ष हर दौर में रहा है। लेकिन इतिहास गवाह है कि अंधेरा भी स्थायी नहीं होता। एक संवाद, एक सहारा, एक विश्वास और एक सकारात्मक विचार कई जिंदगियां बचा सकता है। इसलिए आज सबसे बड़ा संदेश यही है कि परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो, जीवन उससे बड़ा है। हार समस्या का अंत नहीं, संघर्ष छोड़ देने का परिणाम है।

प्रकाशित: 25 May 2026, 09:06 AM · अपडेट: 18 Sep 2026, 10:45 AM
छत्तीसगढ़
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

छत्तीसगढ़ को कभी सहजता, सामूहिकता और सामाजिक आत्मीयता की धरती कहा जाता था। यहां जीवन कठिन जरूर था, लेकिन मन इतना कमजोर नहीं था कि लोग जीने से हार मान लें। आज तस्वीर बदल रही है। अखबारों में रोज आत्महत्या की खबरें हैं। कहीं किसान फांसी लगा रहा है। कहीं बेरोजगार युवक जहर खा रहा है। कहीं पूरा परिवार सामूहिक मौत को गले लगा रहा है। यह अपराध का आंकड़ा ही नहीं, समाज की मानसिक थकान का आईना है।

हाल ही में सामने आई एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो) की रिपोर्ट ने स्थिति को और भयावह बना दिया है। आत्महत्या के मामलों में छत्तीसगढ़ देश के टॉप फाइव राज्यों के भीतर पहुंच गया है। वर्ष 2023 में राज्य में लगभग आठ हजार लोगों ने आत्महत्या की। यह आंकड़ा, आठ हजार टूटे हुए सपनों, बिखरे परिवारों और हार चुके मनों की कहानी है।

रिपोर्ट का सबसे चिंतनीय पहलू अधिकांश आत्महत्याओं के पीछे आर्थिक दबाव को बताया गया है। महंगाई, बेरोजगारी, कर्ज, सामाजिक अपेक्षाएं और भविष्य की असुरक्षा इंसान को भीतर से तोड़ रही हैं। आधुनिक जीवन ने सुविधाएं तो दीं, लेकिन मानसिक संतुलन छीन लिया। आज व्यक्ति के पास मोबाइल है, इंटरनेट है, मनोरंजन है, लेकिन मन की शांति नहीं है।

समाजशास्त्री मानते हैं कि जब समाज में संवाद कम होने लगता है, तब अवसाद बढ़ने लगता है। पहले गांवों में चौपाल होती थी। परिवार साथ बैठता था। दुख साझा होते थे। आज हर व्यक्ति अपने कमरे और मोबाइल में कैद है। बाहर से सब सामान्य दिखते हैं, लेकिन भीतर गहरी बेचैनी पल रही है। यही अकेलापन धीरे-धीरे मानसिक दुर्बलता में बदल रहा है।

धर्म और आध्यात्म भी इसी प्रश्न पर गंभीर संकेत देते हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ। अर्थात दुर्बलता को अपने ऊपर हावी मत होने दो। जीवन संघर्ष है, लेकिन संघर्ष से भागना समाधान नहीं। बौद्ध दर्शन भी दुख को जीवन का सत्य मानता है, लेकिन उससे मुक्ति का मार्ग धैर्य, साधना और जागरूकता में बताता है। हर धर्म जीवन को ईश्वर का अमूल्य उपहार मानता है। इसलिए आत्महत्या एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, समाज की सामूहिक असफलता भी है।

आधुनिकता ने सफलता का एक खतरनाक दबाव भी पैदा किया है। हर व्यक्ति जल्दी सफल दिखना चाहता है। सोशल मीडिया ने तुलना की आग को और बढ़ा दिया है। लोग दूसरों की चमक देखकर अपने संघर्ष को अभिशाप मानने लगे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हर सफल चेहरे के पीछे संघर्ष की लंबी कहानी होती है। जीवन की असफलता स्थायी नहीं होती, लेकिन आत्महत्या स्थायी निर्णय है।

इस संकट का समाधान सिर्फ सरकार या पुलिस के पास नहीं है। यह परिवार, समाज, शिक्षा व्यवस्था, अर्थशास्त्रियों और धार्मिक संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी है। शैक्षणिक संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर संवाद होना चाहिए। परिवारों में संवाद लौटना चाहिए। गांव और शहरों में काउंसलिंग व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सहायक तंत्र खड़े होने चाहिए। सबसे जरूरी यह कि लोगों को यह महसूस कराया जाए कि वे अकेले नहीं हैं।

आज जरूरत आर्थिक विकास के साथ मानसिक विकास की भी है। सड़कें, इमारतें और उद्योग तभी सार्थक हैं, जब समाज जीने की इच्छा बचाए रख सके। हमें फिर से संवेदनशील समाज बनना होगा। ऐसा समाज, जहां कोई व्यक्ति टूटने से पहले किसी का हाथ पकड़ सके।

जीवन कभी पूर्ण नहीं होता। संघर्ष हर दौर में रहा है। लेकिन इतिहास गवाह है कि अंधेर भी स्थायी नहीं होत। एक संवाद, एक सहारा, एक विश्वास और एक सकारात्मक विचार कई जिंदगियां बचा सकता है। इसलिए आज सबसे बड़ा संदेश यही है कि परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो, जीवन उससे बड़ा है। हार समस्या का अंत नहीं, संघर्ष छोड़ देने का परिणाम है।

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